सुविधाओं के अभाव और विशेषज्ञ डॉक्टरों की कमी के कारण नारनौल का जिला अस्पताल केवल रेफरल सेंटर बनकर रह गया है। जिले के सीएचसी और पीएचसी भी केवल सहायकों के सहारे चल रही है। छोटे से गंभीर रोगों के मरीजों को निकटवर्ती जिलों के अलावा प्रदेशों की तरफ रुख करना पड़ता है। निजी अस्पताल संचालक भी चरमराई सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं का पूरा लाभ उठा रहे हैं। विश्व स्वास्थ्य दिवस पर प्रदेश सरकार की तरफ से हर वर्ष बड़ी-बड़ी घोषणाएं की जाती हैं लेकिन हालात सुधरने का नाम नहीं ले रहे हैं। चिकित्सकों की कमी के कारण चलाई जा रहीं राष्ट्रीय कार्यक्रम भी ठप होकर रह गए हैं। नारनौल के जिला अस्पताल में भी विशेषज्ञ चिकित्सकों की कमी है। यहां पर कई वर्षों से विशेषज्ञ चिकित्सक तक नहीं हैं। विशेषज्ञों के अलावा भी यहां चिकित्सकों के अनेक पद रिक्त पड़े हैं। जिला अस्पताल में कुल 39 चिकित्सकों के पद हैं। इसमें से केवल 22 पद ही भरे हैं। रोज केवल 19 चिकित्सक ही आ रहे हैं। इस कारण अस्पताल की सभी सेवाएं चरमराई हुई हैं।
दो चिकित्सकों के हवाले पूरी ओपीडी
जिला अस्पताल में रोज करीब 1000 मरीजों की ओपीडी होती है। इनमें से करीब 700 मरीज जिला अस्पताल में कार्यरत दो चिकित्सक ही देखते हैं। इनमें जनरल फिजिशियन डॉ. सिंघानिया और स्कीन रोग विशेषज्ञ डॉ. अपार शामिल हैं। शेष 300 की ओपीडी अन्य चिकित्सकों के हवाले है। इस कारण इन दो चिकित्सकों के बाहर मरीजों की लंबी कतारें लगी रहती हैं।
कई वर्षों से नहीं है विशेषज्ञ चिकित्सक
जिला अस्पताल में कई सालों से विशेषज्ञ चिकित्सक नहीं है। अस्पताल में हादसों के शिकार और अन्य गंभीर रोगों के अलावा आंखों के मरीजों के उपचार की भी व्यवस्था नहीं है। इस कारण लोगों को रोहतक, दिल्ली या जयपुर के प्राइवेट अस्पतालों में महंगा इलाज कराना पड़ता है। इससे मरीजों को काफी परेशानी होती है।
सर्जन, हड्डी रोग और नेत्र चिकित्सक भी नहीं
जिला अस्पताल में सर्जन, हड्डी रोग और न ही कोई नेत्र चिकित्सक हैं। इस कारण एक्सीडेंट के शिकार मरीजों को तुरंत रेफर कर दिया जाता है। इससे कई मरीजों की मौत भी हो जाती है। सर्जन न होने के कारण छोटा आपरेशन भी कराने के लिए मरीजों को दूसरे शहरों का रुख करना पड़ता है। सर्जन न होने के कारण फैमिली प्लानिंग जैसी राष्ट्रीय योजना को भी झटका लगा है। दो सप्ताह से यहां कोई आपरेशन नहीं हो रहा है। आपरेशन के लिए जो प्राइवेट चिकित्सक हायर किया गया था, वह भी गत सप्ताह नहीं पहुंचा। यहां पर सर्जन का पद तीन साल से रिक्त है। सर्जन के अलावा यहां पर करीब दो साल से आंखों के चिकित्सक का पद भी रिक्त है। इस कारण वृद्धों और आंखों के मरीजों को भारी परेशानी हो रही है। आंखों से कम देखने वाले दिव्यांगों को भी अपना सर्टिफिकेट बनवाने के लिए रेवाड़ी या रोहतक के चक्कर लगाने पड़ रहे हैं। आंखों का चिकित्सक न होने के कारण कई दिनों से यहां बुजुर्गों के लिए कोई कैंप भी नहीं लग पाया है। नागरिक अस्पताल में दो साल से हड्डी रोग विशेषज्ञ नहीं है। ईएनटी और मानसिक रोग विशेषज्ञ के अलावा यहां कार्डियोलाजिस्ट भी नहीं है। हड्डी रोग विशेषज्ञ और ईएनडी रोग का चिकित्सक न होने के कारण यहां आने वाले सैकड़ों मरीजों को निराश ही लौटना पड़ता है।
एक उपलब्धि केवल बच्चों के लिए
जिला अस्पताल में जहां खामियां ही खामियां हैं, वहां पर एक उपलब्धि बच्चों के लिए है। प्रदेश में पंचकूला और भिवानी के बाद यहां पर नवजात बच्चों के लिए एसएनसीयू वार्ड बना हुआ है। जहां पर छह मशीनें हैं। इनमें नवजात बच्चों, प्री-मेच्योर बच्चों, कम वजन वाले बच्चों और गंभीर बीमारी से पीड़ित बच्चों को रखा जाता है। इनके इलाज के लिए कोई भी खर्चा नहीं लगता।