संवाद न्यूज एजेंसी
कुरुक्षेत्र। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने 10 लाख महिला आशा कार्यकर्ताओं को ग्लोबल हेल्थ लीडर्स अवॉर्ड से सम्मानित किया है। ये सम्मान उन्हें ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्य सुविधा पहुंचाने के लिए और कोरोना महामारी के खिलाफ उनकी महत्वपूर्ण भूमिका के लिए मिला है, जिसके लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी आशा कार्यकर्ताओं को बधाई दी है।
इस अवॉर्ड से आशा कार्यकर्ता खुश है, लेकिन उनका यह भी कहना है कि सिर्फ सम्मान से कुछ नहीं होगा, वह अपनी मांगों के संदर्भ में कई वर्षों से संघर्ष कर रही हैं, लेकिन सरकार उनकी मांगों को अनसुना कर रही है। असल में उनका असल में सम्मान वही होगा जब सरकार उनकी सभी मांगों को मान लेगी।
आशा कार्यकर्ताओं की जिला प्रधान पिंकी ने बताया कि उनकी नजर में असली सम्मान वही होगा जब सरकार उनकी सभी मांगों को मान लेगी। उन्हें आज तक सरकार की ओर से सिर्फ आश्वासन ही मिलते आए हैं। आशा कार्यकर्ताओं से जितना काम लिया जाता है उसके अनुरूप सुविधाएं नहीं दी जा रही।
सुमन ने कहा कि सिर्फ अवार्ड से पेट नहीं भरता, आशा कार्यकर्ताओं को वे सब हक भी मिलने चाहिए, जिनकी वे पिछले लंबे समय से मांग कर रही हैं। कोरोना काल में जब संक्रमित व्यक्ति के पास उस घर वाले भी नहीं जाते थे, ऐसे समय में हमने उन्हें दवाइयों खिलाई। फिर भी हमारे हकों को अनदेखा किया जा रहा है।
बबली ने कहा कि सरकार उनसे जितना काम लेती है, उसके मुकाबले उनका मानदेय बहुत ही कम है। उन्हें चार हजार रुपये प्रति माह मानदेय मिलता है। महंगाई के दौर में इतने रुपये में घर चलाना बहुत मुश्किल है। एक हजार रुपये का तो सिर्फ गैस सिलिंडर ही आता है, इसके अलावा राशन-पानी के साथ अन्य खर्चे पूरे नहीं हो पाते।
जसवंत कौर ने कहा कि वे अपनी मांगों के समर्थन में कई बार आंदोलन कर चुकी हैं। अब कहीं पर भी जाती हैं तो लोग कहते हैं कि क्या हुआ तुम्हारा आंदोलन रंग लाया या नहीं। ये सब बातें सुनकर अब तो हमें खुद को आशा कार्यकर्ता कहने में भी शर्म आने लगी है। सरकार मांगें पूरी करने के बजाए सिर्फ आश्वासन दे रही है।
मीना रानी ने कहा कि सरकार बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ का नारा दे रही है, लेकिन जब बेटियां या महिलाएं अपनी मांगों को लेकर कई-कई दिनों तक सड़कों पर बैठी रहती हैं, तब उनकी कोई सुध भी नहीं लेता। आशा कार्यकर्ताओं को अवार्ड मिलना खुशी की बात है, लेकिन उनके हकों की तरफ भी ध्यान दिया जाए।
मीना देवी ने कहा कि कोरोना काल में कई बार चिकित्सक भी संक्रमित व्यक्ति से दूरी बना लेते थे, लेकिन आशा कार्यकर्ता फिर भी एक-एक घर में पहुंचीं। कई बार तो उन्हें लोगों के विरोध का भी सामना करना पड़ा। अपना फर्ज निभाने के चलने उन्होंने न दिन देखा और न रात बस सेवाभाव से अपने काम में लगी रहीं।
कमलेश ने कहा कि अपनी मांगों को लेकर फिर से वे आंदोलन करने की तैयारी कर रही हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने तो उन्हें सम्मान दे दिया है अब सरकार हमारी मांगें मानकर कब हमें सम्मानित करेगी यह देखना बाकी है। इस बार के आंदोलन में वे मांगों को मनवाए बगैर पीछे नहीं हटेंगी। आरपार की लड़ाई लड़ी जाएगी।
राज रानी ने कहा कि विश्व स्वास्थ्य संगठन ने आशा कार्यकर्ताओं को ग्लोबल हेल्थ लीडर अवार्ड देकर मान बढ़ाया है। इससे सभी आशा कार्यकर्ताओं का हौसला बढ़ा है। आशा कार्यकर्ता कैसे धूप, बारिश व आंधी-तूफान की परवाह किए बगैर अपनी ड्यूटी निभाती हैं। सरकार से गुजारिश है कि उनकी मांगों को जल्द से जल्द मान ले।
आशा कार्यकर्ताओं की ये हैं मांगें
स्थाई कर्मचारी का दर्जा दिया जाए। न्यूनतम मानदेय 24 हजार रुपये किया जाए। आशा कार्यकर्ता को हेल्थ कार्यकर्ता का दर्जा दिया जाए। सरकार के पैनल में इलाज की सुविधा दी जाए। सातवें वेतन आयोग में जोड़ा जाए। आयुष्मान कार्ड बनाए जाएं। सीएम की ओर से घोषित 50 हजार रुपये की राशि जल्द दी जाए। समय-समय पर ट्रेनिंग दी जाए। कोरोना काल में दी जाने वाली एक हजार रुपये राशि लागू की जाए।