कुुरुक्षेत्र में चल रहे अंतरराष्ट्रीय गीता महोत्सव में यूपी के इटावा से आई मीना यादव के हाथ से बनी आर्टिफिशियल ज्वैलरी आकर्षण का केंद्र बनी हुई है। मीना यादव का आर्टिफिशियल ज्वेलरी बनाने का बचपन का शौक 55 साल की उम्र में भी कायम है। अब उनका शौक एक कला बन चुका है।
मीना यादव बताती हैं कि बचपन में वह अपनी गुड़िया-गुड्डों के लिए तरह तरह की मालाएं, बालियां, टॉप्स व अन्य तरह की आर्टिफिशियल ज्वेलरी बनाती थी। 13 साल की उम्र में उनके माता पिता ने उनकी शादी कर दी थी। इसके बाद उन्हें ससुराल में चूल्हा चौका संभालना पड़ा। पारिवारिक जिम्मेदारियों के बीच समय भी गुजरता रहा। इस दौरान 22 साल की उम्र में उनकी जिंदगी में ऐसी घटना हुई जिसने उनके जीवन को खास बना दिया।
दरअसल, हुआ यूं की जब उन्होंने एक स्थानीय मेले से अपने लिए 50 रुपये की मोतियों की एक माला खरीदी, जो घर आने पर टूट गई। उस टूटी माला को देखकर उनका मन बहुत खिन्न हो गया और मीना उसी माला के मोतियों को समेट कर दूसरी माला बनाने में लीन हो गई। हालांकि उसे बनाने में बचपन के मुकाबले में कुछ ज्यादा समय लग गया। इसी दौरान उनको घर में पड़े बेकार सामान से आर्टिफिशियल कुछ सामान बनाकर उसे मार्केट में बेचने का सूझा।
मीना ने बताया कि उन्होंने मार्केट से कुछ मोती लेकर उनकी माला, ब्रेसलेट, बालियां, टॉप्स व कुछ अन्य सामान बनाकर बेचना शुरू किया। उनकी कला के कद्रदान भी उनको मिलने लगे। यहां से उनके कारोबार की नींव पड़ गई। उसके बाद उन्होंने धीरे-धीरे मेले में स्टॉल लगानी शुरू की, जहां उनकी कला को पहचान मिल गई। इसी बूते पर उनको उत्तर प्रदेश सरकार की ओर से साल 2003-04 और 2007-08 में दो बार राज्य प्रादेशिक अवार्ड से नवाजा गया।
यादव ने बताया ने वह आठ साल से गीता महोत्सव में आ रही हैं। उनके स्टॉल पर सभी सामान हाथ से बना हुआ है। दावा करते हुए कहा कि उनकी बनाई आर्टिफिशियल ज्वेलरी का डिजाइन भी सबसे अलग है, जो सिर्फ उनके पास ही है। उनके पास गीता महोत्सव में स्टॉल-22 पर मालाएं, बालियां, मंगलसूत्र, टॉप्स, बंदरवाल, छल्ले, ब्रेसलेट सहित अन्य सामान 50 से 400 रुपये की कीमत पर उपलब्ध है।
मीना यादव अब यह काम खुद नहीं कर रही हैं। हालांकि उनके बेटे काम करते हैं। उन्होंने महिलाओं का एक समूह बनाया हुआ है, जिसमे एक हजार महिलाएं काम करती हैं। मीना उनसे सामान खरीदकर आगे बेचती है। इसके आधार उनसे जुड़ी महिलाओं को आमदनी हो रही है।
मीना यादव ने बताया कि साल 2003 में उनको यूपी सरकार के मत्स्य विभाग में बतौर एसडीओ लगने का मौका मिला था, जिसे उन्होंने यह कहकर ठुकरा दिया कि वह कला और कारोबार से संतुष्ट हैं।