माई सिटी रिपोर्टर
करनाल। किसी भी व्यक्ति की कामयाबी उसके जज्बे पर निर्भर करती है। यदि दृढ़ निश्चय कर लिया हो तो आगे बढ़ने से कोई रोक नहीं सकता। यह कहना है जिला युवा अधिकारी रेनू सिलग का। उन्होंने कहा कि सफलता मोबाइल फोन से नहीं बल्कि किताबों से ही मिल सकती है। इसलिए किताबों को महत्व देना चाहिए।
रेनू ने बताया कि जन्म से दो माह पहले ही पिता सुरेश कुमार की हादसे में मौत हो गई थी। मां ने दिन-रात मेहनत की। दिन में मनके बनाती थी और रात में सिलाई का काम करती थी। कुछ इस तरह उन्हें व उनकी बहन को पाल कर बड़ा किया। मां ने हमेशा दुनियावी चीजों से बचने की सलाह दी और पढ़ाई पर ही जोर दिया। पिता के न रहने के बाद चाचा भूप सिंह ने बहुत सहारा दिया। गांव का माहौल खराब होने के कारण शाम होते ही किसी को भी घर से बाहर जाने की मनाही थी लेकिन चाचा हमेशा हौसला बढ़ाते थे।
हिसार के अपने गांव मंगली से दसवीं कक्षा पास कर आगे की पढ़ाई अंबाला में की। आईटी में डिप्लोमा किया। अधिक पढ़ाई के लिए लोन नहीं मिल सका फिर भी हिम्मत नहीं हारी और मेहनत कर स्कॉलरशिप प्राप्त की और पढ़ाई के दौरान ही नौकरी के लिए प्रयास किया। 2012 से 2018 तक छह वर्ष का समय बहुत सघंर्ष से भरा रहा। इसी दौरान आईटी में डिप्लोमा, मास्टर्स और बीएड किया। एक समय ऐसा भी आया, जब कामयाबी न मिलने से निराशा हावी होने लगी थी।
अब बेहतर हैं हालात
दो दोस्तों ने हिम्मत बढ़ाई और प्रयास जारी रखने पर जोर दिया। तभी 2019 में हालात बदले कामयाबी मिल ही गई। शुरूआती दौर में लगता था ईश्वर मुझे लड़का बनाकर पैदा करता तो ठीक था। पर अब हालात बेहतर हैं। खेल के क्षेत्र में जाने का मन था लेकिन जो होता है अच्छे के लिए होता है। नेहरू युवा केंद्र में जिला युवा अधिकारी बनने के बाद अपनी बात ज्यादा से ज्यादा युवाओं तक पहुंचा सकती हूं। खास कर महिलाओं को अपनी पढ़ाई पर जोर देने, हिम्मत और जज्बा बनाए रखने के लिए प्रेरित करती हूं। मेरी कामयाबी के पीछे मेरी मां दर्शनी देवी, चाचा भूप सिंह, बहन नीतू और मेरे सभी दोस्तों का बहुत बड़ा योगदान हैं।