चैत्र माह के शुक्ल पक्ष की छठी तिथि को चैती छठ का पर्व शुरू हो चुका है। जिसकी शुरुआत नहाय-खाय के साथ हुई है। वीरवार शाम को व्रती श्रद्धालुओं ने पश्चिमी यमुना नहर के किनारे पहुंचे कर डूबते सूर्य को अर्घ्य दिया और मनोकामाना पूरी होने का व्रत किया। शुक्रवार को उगते सूर्य को अर्घ्य देने का समय- 8 अप्रैल को सुबह 6 बजकर 40 मिनट में सूर्योदय है।
दूसरे दिन खरना हुआ। पंचाग के अनुसार, साल में दो बार छठ पर्व मनाया जाता है। पहला चैत्र माह में और दूसरा कार्तिक माह में पड़ने वाली छठ। कार्तिक माह में आने वाली छठ पर्व का महत्व अधिक होता है। खरना के दिन व्रती रात को पूजा के बाद गुड़ की खीर खाई और 36 घंटे का निर्जला व्रत रखा। इसका समापन चौथे दिन सूर्योदय के समय सूर्य को अर्घ्य देने के साथ समाप्त होगा। खरना के दिन सुबह स्नान आदि के बाद सूर्य देव की पूजा की गई और व्रत रखा गया। शाम को पूजा के लिए गुड़ की खीर और रोट बनाई गई। भोग को रसिया के नाम के जानते हैं। खरना का प्रसाद मिट्टी के चूल्हे में आम की लकड़ी जलाकर बनाया जाता है। साथ ही इसे मिट्टी या पीतल के ही बर्तनों में बनाते हैं। अगर आपके पास चूल्हा नहीं है, तो साफ गैस भी रख सकते हैं। भगवान सूर्य देव को भोग लगाने से पहले प्रसाद को केले के पत्ते पर रखा जाता है।