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हैफेड के गोदाम पर कम हो गया 1018 क्विंटल गेहूं, आढ़तियों को 24 लाख की चपत

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करनाल। गेहूं खरीद एजेंसी हैफेड ने करनाल के आढ़तियों को 24 लाख रुपये का झटका दे दिया है। आढ़तियों ने अनाज मंडी में गेहूं खरीदा था। लेकिन जब वह गेहूं हैफेड के गोडाउन में दोबारा तोला गया तो उसमें करीब 1018 क्विंटल कम निकला। हैफेड ने इसके लिए आढ़तियों को जिम्मेदार मानते हुए उनकी आढ़त में से करीब 2325 लाख रुपये की दर से करीब 24 लाख रुपये से अधिक की कटौती कर ली। जिसे अब अनाज मंडी आढ़ती एसोसिएशन वापस करने की मांग कर रही है। स्टेट चेयरमैन का कहना है कि यह भी जानकारी जुटाई जा रही है कि ऐसा सिर्फ करनाल में किया गया है या प्रदेश की अन्य मंडियों में भी। यदि सभी मंडियों में कटौती की गई है तो यह धनराशि करोड़ों में हो सकती है। इसे प्रदेश स्तरीय बैठक में रखा जाएगा।
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अन्य एजेंसियों के गोदामों पर कम क्यों नहीं हुआ गेहूं
आढ़तियों ने सवाल उठाया है कि गेहूं की खरीद तो डीएफएससी, एफसीआई ने भी की है तो सिर्फ हैफेड के गोदामों पर ही बोरियों का भार कम क्यों पाया गया है। अन्य एजेंसियों के गोदामों पर गेहूं का भार उतना ही निकला, जितना मंडी में तोला गया था। आढ़तियों ने इस मामले की जांच की मांग की है।
खरीदा 1975 में तो कटौती 2360 रुपये प्रति क्विंटल क्यों
दूसरी बड़ी बात यह है कि गेहूं का न्यूनतम समर्थन मूल्य तो 1975 रुपये प्रति क्विंटल है। इसी रेट पर खरीद एजेंसियों ने आढ़तियों के माध्यम से गेहूं को खरीदा भी है और किसानों को भुगतान भी इसी मूल्य पर किया गया है तो फिर जो गेहूं कम बताया जा रहा है, उसकी कटौती 2360 रुपये प्रति क्विंटल की दर से क्यों की गई है। हैफेड के मुताबिक जो गेहूं था ही नहीं, उस पर अन्य खर्च कैसे लगा दिया गया।
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आढ़तियों की जिम्मेदारी तो अनाज मंडी में खरीद कराने की है। खरीद तो एजेंसियां करती हैं और उठान भी वहीं कराती हैं। अनाज मंडी में उन्हीं खरीद एजेंसियों को गेहूं पूरा दिया गया तो गोदाम में जाकर कम कैसे हो गया। पूरे प्रदेश से जानकारी जुटाई जा रही है कि हैफेड ने किन किन मंडियों में कटौती की है। इसके बाद प्रदेशस्तर पर आंदोलनात्मक रणनीति तय की जाएगी।
-रजनीश चौधरी, स्टेट चेयरमैन व प्रधान अनाज मंडी आढ़ती एसोसिएशन करनाल
यदि किसी तरह गेहूं कम हो भी गया तो इसके लिए आढ़तियों को जिम्मेदार क्यों माना जा रहा है। उनकी आढ़त से कटौती क्यों की जा रही है। जबकि खरीद से लेकर उठान तक की सारी जिम्मेदारी खरीद एजेंसियों की है।
-राजेश अरोड़ा, सचिव अनाज मंडी आढ़ती एसोसिएशन करनाल
-आढ़तियों को पहले से कई बार सरकार झटका दे चुकी है। चाहे वह किसानों के खातों में सीधे भुगतान का मामला हो या पोर्टल पंजीकरण का मामला। आढ़ती तो लंबे समय से मंडियों में खरीद व्यवस्था में सरकार का सहयोग ही करते हैं।
-राकेश चौधरी, आढ़ती अनाज मंडी करनाल
-पहले आढ़ती ही अपने संसाधनों से गेहूं को खरीद एजेंसी के गोदामों तक खरीदी गई फसलों को पहुंचाते थे लेकिन इस बार तो सरकार ने इसके लिए अलग से ठेकेदारों को लगाया था। तब गेहूं कम निकलने के लिए आढ़तियों को जिम्मेदार क्यों माना जा रहा है।
-महिंद्र गर्ग, आढ़ती अनाज मंडी करनाल
-हरियाणा सरकार ने धान खरीद के लिए अभी तक सिर्फ हरियाणा के किसानों के लिए पोर्टल खोला है। जबकि बड़ी संख्या में यूपी, बिहार, पंजाब, राजस्थान आदि पड़ोसी राज्यों से किसान अपना धान यहां लाते हैं। पोर्टल को सभी के लिए खोला जाना चाहिए।
-राजेंद्र गुप्ता, आढ़ती अनाज मंडी करनाल
-केंद्र सरकार के कानूनों के तहत किसान कहीं भी अपनी फसल बेच सकता है, तो उन्हें हरियाणा आने से क्यों रोका जा रहा है। खरीद एजेंसियों को अनाज मंडियों में ही गेहूं की तोल देखनी चाहिए, गोदामों की जिम्मेदारी आढ़तियों की नहीं होनी चाहिए।
रणवीर सिंह खारा, मुख्य सलाहकार, अनाज मंडी आढ़ती एसोसिएशन करनाल
अब सबकुछ ऑनलाइन है। जब गोदाम पर तोल होती है तो वह भी तत्काल अपलोड होती है इसलिए स्थानीय स्तर पर इसमें कोई चूक हो ही नहीं सकती। जितना गेहूं है उतना भार दर्ज होता है और उसी का भुगतान स्वत: ही होता है। रही बात 2360 रुपये रेट की तो इसमें बारदाना, ट्रक का किराया, ढुलाई आदि सबकुछ जुड़ा है।
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ईश्वर ग्रोवर, प्रबंधक हैफेड, करनाल
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