शहर और आसपास के क्षेत्रों में रह रहे प्रवासी मजदूरों को सूचना मिली की उन्हें घर भेजा जा रहा है। जानकारी मिलते ही मजदूर दौड़ पड़े। बाद में प्रशासन ने बताया कि सिर्फ ऐसे लोगों को ही उनके घर भेजा जा रहा है, जो कृषि कार्य में लगे हुए हैं। लेकिन शाम सात बजे निर्णय लिया कि बिहार के सात जिलों के मजदूरों को भेजा जाएगा। इन जिलों के मजदूरों को संदेश भेजकर बुलाया गया। जानकारी मिलने के बाद तीन सौ के करीब मजदूर सात बजे तक जुट गए। दूसरी ततरफ प्रशासनिक अधिकारियों में तालमेल नहीं होने के कारण मजदूर धक्के खाने के लिए मजबूर हैं। शाम सात बजे तक मजदूर राजकीय कॉलेज के बाहर घूमते रहे। वहीं घर भेजने के लिए कॉलेज के अंदर रखे गए मजदूरों को शाम सात बजे तक न तो पानी मिला और न ही खाना।
दरअसल प्रशासन ने योजना बनाई थी कि बिहार के रहने वाले प्रवासियों को उनके घर भेजा जाएगा। ऐसे में प्रशासन की टीम इन मजदूरों को संदेश भेजकर राजकीय कॉलेज में बुला लिया। मंगलवार सुबह एसडीएम सत्यवान मान व तहसीलदार मनोज कुमार भी यहां पहुंच गए। वहीं सूचना मिलने पर 200 प्रवासी राजकीय कॉलेज पहुंच गए। इस पर पुलिस कर्मियों ने 20 लोगों को कॉलेज के अंदर बुला लिया और अन्य को बाहर रख दिया। कॉलेज के बाहर रह गए लोगों को बताया गया कि वे अपने-अपने ठिकानों पर लौट जाएं। प्रशासन उन्हें खुद बुलाएगा। लेकिन सात बजे निर्णय लिया गया कि बिहार के सात जिलों के मजदूरों को भेजा जाएगा।
पहले सभी को फिर सात जिलों के और फिर सिर्फ खेती से जुड़े लोगों का हुआ फैसला
प्रवासी मजदूरों को घर भेजने के लिए प्रशासन में तालमेल की कमी दिखाई दी। पहले प्रशासनिक टीम ने बिहार मूल के सभी प्रवासियों को संदेश भेज दिया, लेकिन बाद में कहा गया कि सिर्फ सात जिलों अररिया, कटिहार, किशनगंज, पूर्णिया, मधेपुरा, सहरसा और सुपौल के ही मजदूर जाएंगे। इस पर भी बड़ी संख्या में मजदूर राजकीय कॉलेज के गेट पर पहुंच गए। इसके बाद तय किया गया कि सिर्फ खेती के काम में लगे मजदूरों को ही पहले चरण में भेजा जाएगा, लेकिन शाम सात बजे यह तय किया बिहार के सात जिले के लोगों को उनके घर भेजा जाएगा।
यह है स्थिति
प्रशासन द्वारा तैयार किए गए आंकड़ों के अनुसार जिले में कुल 4130 ऐसे लोगों की पहचान हुई है, जो दूसरे राज्यों के रहने वाले हैं। इनमें राजस्थान के 75, उत्तर प्रदेश के 920, उत्तराखंड के 20, बिहार के 1425, मध्यप्रदेश के 100 लोग शामिल हैं। एसडीएम सत्यवान मान के अनुसार इनकी जानकारी जुटाई जा रही है।
कमरे खाली कर आ गए, अब कहां जाएं
राजयकी कॉलेज के गेट पर पहुंचे मजदूरों ने कहा कि वे जहां रह रहे थे, वहां से अब कमरे खाली कर दिए हैं। ऐसे में दोबारा वहां जगह मिलने की उम्मीद नहीं है। न ही उनके पास कोई संसाधन है जिससे वे जीवनयापन कर सकें। ऐसे में वे मझधार में फंस गए हैं।
तीन महीने पहले आए और लॉकडाउन में फंस गए
उत्तर प्रदेश के बरेली जिला निवासी गुड्डू व उसकी पत्नी किरण के अनुसार वे तीन महीने पहले ही काम की तलाश में यहां आए थे। आने के कुछ समय बाद काम शुरू किया त लॉकडाउन लागू हो गया। अब उनके पास पैसे भी नहीं हैं जिसकी वजह से उन्हें बहुत कठिनाई हो रही है। रहने का ठिकाना बी नहीं बचा है। प्रशासन से कोई सही जानकारी नहीं मिल रही है। अब उनका जीवन भगवान भरोसे है।
यह मामला संज्ञान में आया है कि प्रवासी लोगों के जाने को लेकर असमंजस की स्थिति रही है। इसमें तय हो गया है कि पहले कृषि कार्यों में लगे लोगों को ही भेजा जाएगा। राजकीय कॉलेज में रुके मजदूरों को खाना और पानी नहीं मिलने के मामले का भी पता चला है। इसकी व्यवस्था करवाई जा रही है। साथ ही प्रवासी लोगों से आह्वान किया गया है कि वे सरकारी कार्यालय या बस स्टैंड, रेलवे स्टेशन पर न जाएं। वे या तो हेल्पलाइन नंबर से प्रशासन को सूचना दें या ऑनइलाइन पंजीकरण करवाएं ताकि सभी की व्यवस्था की जाएगी। इसके लिए आंकड़े तैयार किए जा रहे हैं।
डॉ. आदित्य दहिया, डीसी।
अपना सामान उठाकर वापस जाते बरेली निवासी किरण व गुड्डू- फोटो : Jind
घर भेजने की सूचना पाकर राजकीय कॉलेज जाते मजदूर। - फोटो : Jind
राजकीय कॉलेज के बाहर पहुंचे प्रवासी।- फोटो : Jind