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बजरंग बचपन से ही धुन का पक्का : कोच

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अपने शिष्य बजरंग की जीत की खुशी में मिठाई खाते कोच आर्य वीरेंद्र। - फोटो : Bahadurgarh
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पहलवान बजरंग पूनिया द्वारा टोक्यो ओलंपिक में 65 किलोग्राम भार वर्ग की कुश्ती में कांस्य पदक जीतने की खुशी में गांव छारा स्थित उनके प्रारंभिक अखाड़े में मिठाई बांटकर और तिरंगा ध्वज लहराकर खुशियां मनाई गई। बजरंग ने कुश्ती स्पर्धा में कजाकिस्तान के पहलवान दौलत को 8-0 हराकर बड़ी सफलता हासिल की है।
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रात दो बजे अखाड़े में पहुंच जाता था बजरंग
बजरंग 11 साल की उम्र से ही छारा स्थित लाला दीवान चंद योग एवं कुश्ती प्रशिक्षण केंद्र में कुश्ती के दांव पेच सीखने लग गया था। यहां उनको उनके कोच आर्य वीरेंद्र प्रशिक्षण देते थे। कोच वीरेंद्र ने बताया कि बजरंग कुश्ती सीखने के लिए बहुत उत्सुक रहता था। रात को दो बजे ही अखाड़े में पहुंच जाता था। परिवार के लोग इतनी रात को जाने से मना करते तो बिना बताए निकल आता। अपने चारपाई पर तकिए को इस तरह सीधा करके रखता कि देखने वाले को लगता बजरंग सो रहा है। उन्होंने बताया कि अखाड़े में वह छह-सात घंटे तक कड़ा अभ्यास करके घर जाता और मां रामप्यारी को बताता था कि चार बजे ही गया था।
अपने से तगड़े पहलवान से भी भिड़ने को तैयार
कोच आर्य ने बताया कि बाल पहलवान बजरंग पूरा दिन अखाड़े में ही रहना पसंद करता था। अपने से अधिक वजन से बाल पहलवानों से भिड़ने से नहीं घबराता था। वर्ष 2008 में उसका वजन सिर्फ 34 किलो था। उस समय झज्जर के पास माछरोली गांव में हुए एक दंगल में वह करीब 60 किलोग्राम के पहलवान से कुश्ती लड़ने के लिए दंगल में आ गया था। छारा अखाड़े में बजरंग ने करीब छह साल तक कुश्ती की बारीकियां सीखी। साल 2008 में उनके पिता बलवान सिंह ने बजरंग को दिल्ली के छत्रसाल स्टेडियम में भर्ती करवा दिया था।
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कोच आर्य वीरेंद्र पहलवान ने बताया कि उन्हें बेहद खुशी है कि उनका शिष्य आज पूरे विश्व में भारत का नाम रोशन कर रहा है। बजरंग जब भी जीतकर आता है तो उनके पास अखाड़े में जरूर आता है। आर्य प्रमोद छारा ने भी पहलवान बजरंग पूनिया का स्वागत किया। उन्होंने कहा कि हमें अपने खिलाड़ियों पर गर्व है, जो न केवल अपने प्रदेश हरियाणा बल्कि देश का नाम अंतरराष्ट्रीय पटल पर चमका रहे हैं। विजेता खिलाड़ी की इस उपलब्धि से उसके परिवार में खुशी का माहौल है।
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