पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय ने 9 दिसंबर 2025 को सुनाए गए फैसले में रेलूराम हत्याकांड के दोषियों सोनिया व संजीव को अंतरिम जमानत दी थी।जिसको लेकर रेलूराम के भतीजे जितेंद्र व अन्य ने सुप्रीम कोर्ट में विशेष अनुमति याचिका दायर की थी।
पूर्व विधायक रेलूराम हत्याकांड मामले में दोषी सोनिया-संजीव को पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट से अंतरिम जमानत दिए जाने के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने वीरवार को सुनवाई होगी। पिछले 11 अगस्त की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने दोनों पक्षों को सुनने के बाद प्रदेश सरकार की कैदियों की रिहाई के बारे में 2000 से लेकर अब तक बनाई गई सभी नीतियों का ब्योरा प्रस्तुत करने के निर्देश दिए थे।
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इससे पहले सुप्रीम कोर्ट न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता और न्यायमूर्ति शील नागू की पीठ ने जितेंद्र अन्य और बनाम संजीव कुमार अन्य से संबंधित विशेष अनुमति याचिकाओं पर 11 अगस्त को सुनवाइ की थी। जिसमें याचिकाकर्ताओं की ओर से लोकेश सिंहल और मुक्ता गुप्ता , एडवोकेट आइना वर्मा खोवाल, लाल बहादुर खोवाल ने पक्ष रखा।
प्रतिवादियों का प्रतिनिधित्व अशोक कुमार शर्मा ,पीएस दत्ता ने दलील पेश की। न्यायालय ने सभी संबंधित पक्षों को मामले से जुड़ी सभी प्रासंगिक नीतियों का संकलन रिकॉर्ड पर लाने का भी निर्देश दिया। यह निर्देश मामले की व्यापक समीक्षा के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है। इन याचिकाओं को नियमित मामलों से पहले सुना जाएगा ताकि त्वरित निपटान सुनिश्चित हो सके। न्यायालय ने सभी संबंधित नीतियों का एक संकलन रिकॉर्ड पर लाने का आदेश दिया था।
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पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय ने 9 दिसंबर 2025 को सुनाए गए फैसले में रेलूराम हत्याकांड के दोषियों सोनिया व संजीव को अंतरिम जमानत दी थी।जिसको लेकर रेलूराम के भतीजे जितेंद्र व अन्य ने सुप्रीम कोर्ट में विशेष अनुमति याचिका दायर की थी। जिसमें हाईकोर्ट के आपराधिक रिट याचिका संख्या 10858/2024 को चुनौती दी थी।
क्या है मामला
सोनिया व संजीव ने अगस्त 2001 में लितानी गांव स्थित फार्म हाउस में अपने पिता पूर्व विधायक रेलूराम पूनिया (50), उनकी पत्नी कृष्णा देवी (41), पुत्र सुनील (23), बहू शकुंतला (20), पुत्री प्रियंका (14), पोता लोकेश (4), पोतियां शिवानी (2) और 45 दिन की प्रीति की हत्या कर दी थी। मई 2004 में हिसार की अदालत ने दोनों को फांसी की सजा सुनाई। वर्ष 2007 में सुप्रीम कोर्ट ने भी इस सजा को बरकरार रखा। बाद में सुप्रीम कोर्ट ने ही फांसी की सजा को आजीवन कारावास में बदल दिया था।