गांव बैजलपुर के दो जांबाज सिपाहियों ने नेताजी सुभाष चंद्र बोस की आजाद हिंद फौज में भर्ती होकर अंग्रेजी हुकूमत के पसीने छूटवाने में अहम भूमिका निभाई। देश को आजादी मिलने के 75 साल होने को हैं, लेकिन अभी भी स्वतंत्रता सेनानियों के गांव बैजलपुर में पर्याप्त मात्रा में मूलभूत सुविधाएं नहीं है। आज से 22 साल पहले भी प्रशासन गंभीर नहीं था। इसलिए इन दो जांबाजों में से एक स्वतंत्रता सेनानी रतीराम कादियान ने शासन-प्रशासन की अनदेखी के बाद वर्ष 1999 में अपने खर्चे पर आजाद हिंद फौज के संस्थापक और अपने लीडर नेताजी सुभाष चंद्र का गांव के बस स्टैंड पर स्मारक बनवाया था।
दरअसल, गांव बैजलपुर का जंग-ए-आजादी में शौर्यपूर्ण इतिहास रहा है। गांव के दो स्वाधीनता सेनानियों रतीराम कादियान व श्योकरण खाखल ने 1931-32 के सिविल नारमानी और नमक सत्याग्रह के बाद 1942 के ऐतिहासिक भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान जेल में अंग्रेजी हुकूमत की यातनाएं झेली। आजादी का कोई भी आंदोलन चला उसमें ये सेनानी सबसे आगे रहे। गांव के गौरव पट्ट पर लिखे इन सेनानियों के नाम आज भी गांव के युवाओं में देशसेवा का जज्बा भरने का काम करते हैं।
मात्र 20 साल की उम्र में रतीराम ने अंग्रेजों के खिलाफ विद्रोह कर दिया था
गांव बैजलपुर निवासी रतीराम कादियान ने मात्र 20 वर्ष की आयु में ही अंग्रेजों के खिलाफ विद्रोह शुरू कर दिया था। उन्होंने आजाद हिंद फौज में शामिल होकर देश की आजादी के लिए काफी प्रयास किए। बड़ी कठिन दौर से गुजरे। स्वतंत्रता संग्राम के योद्धा रतीराम को लगातार दो वर्षों तक जेल में कैद रखा गया। परंतु 1946 में अंग्रेजों के शासन की चूल हिल गई थी, इसलिए आजाद हिंद फौज के सैनिकों को रिहा कर दिया गया। बहादुरी के कारण रतीराम को तीन मेडल पहनाकर सम्मानित किया गया था। 15 मई 2003 को स्वतंत्रता सेनानी रतीराम का निधन हो गया। प्रशासनिक स्तर पर उनके मेडल एवं ट्रॉफी आदि फतेहाबाद मुख्यालय पर यादगार के लिए ले गए। उनके दो बेटे व पांच बेटियां हैं। मगर परिजनों को मलाल है कि स्व. रतीराम जैसे आजादी के मतवालों की यादगार में गांव में कोई भी चीज उनके नाम से नहीं बनाई गई है।
सात महीने जेल में रहे थे श्योकरण खाखल
गांव बैजलपुर निवासी सिपाही श्योकरण खाखल ने भी 1942 में आजाद हिंद फौज में भर्ती होकर अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ जंग लड़ी थी। बर्मा में लड़ाई के दौरान उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। उन्हें करीब सात महीने तक जेल में कठोर यातनाएं दी गई। देश को अंग्रेजों से आजादी मिलने के कुछ महीनों पहले उन्हें रिहा किया गया था। वर्ष 2005 में स्वतंत्रता सेनानी श्योकरण खाखल का निधन हो गया। उनके तीन बेटे हैं, जिनमें अमर सिंह, नेपाल सिंह व लक्ष्मण सिंह शामिल है। अमर सिंह का हृदय गति रुकने से तीन साल पहले निधन हो चुका है। देश की आजादी को लेकर दादा की बहादुरी को लेकर उनके पोते एवं पोतियां भी फर्क महसूस कर रहे हैं।
स्वतंत्रता सेनानी के परिजनों की हो रही अनदेखी
देश की आजादी के नायक रतीराम कादियान के बेटे धर्मपाल कादियान ने बताया कि उनके पिता के देहांत के बाद परिजनों को स्वतंत्रता समारोह या गणतंत्र दिवस समारोह पर निमंत्रण देना बंद कर दिया गया है। अब तो उपमंडल स्तर पर होने वाले कार्यक्रमों में भी कोई याद नहीं करता है। उन्होंने मांग की कि गांव में स्वतंत्रता सेनानियों की याद में स्मारक बनने चाहिए, जिससे युवा पीढ़ी उनसे प्रेरणा ले सकें।
स्वतंत्रता सेनानी श्योकरण।- फोटो : Fatehabad