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हरियाणा की सियासत से राजभवन तक का सफर: कौन हैं सुधा यादव? जो बनीं कर्नाटक की नई राज्यपाल

Mon, 12 Oct 2026 09:57 PM IST
शाहिल शर्मा अमर उजाला ब्यूरो, चंडीगढ़

सार

सुधा यादव का राजनीतिक सफर 1999 में शुरू हुआ था। कारगिल युद्ध के दौरान उनके पति और सीमा सुरक्षा बल में डिप्टी कमांडेंट रहे सुखबीर सिंह यादव शहीद हो गए थे। पति की शहादत के बाद सुधा यादव राजनीति में आई थीं। पढ़ें पूरी खबर
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डॉ. सुधा यादव, कर्नाटक की नई राज्यपाल - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स
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विस्तार
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हरियाणा भाजपा की वरिष्ठ नेता और पूर्व सांसद डॉ. सुधा यादव को कर्नाटक का राज्यपाल नियुक्त किया गया है। उनकी नियुक्ति को हरियाणा की राजनीति में भाजपा के पुराने नेतृत्व और संगठन से जुड़े नेताओं के महत्व के संदर्भ में देखा जा रहा है। खास बात यह है कि करीब एक महीने पहले ही उनके बेटे को भाजपा की राष्ट्रीय टीम में मीडिया सह-संयोजक की जिम्मेदारी मिली थी। मां को राज्यपाल और बेटे को राष्ट्रीय संगठन में जिम्मेदारी मिलने से यादव परिवार एक बार फिर राजनीतिक चर्चा में है।

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सुधा यादव का राजनीतिक सफर
सुधा यादव का राजनीतिक सफर 1999 में शुरू हुआ था। कारगिल युद्ध के दौरान उनके पति और सीमा सुरक्षा बल में डिप्टी कमांडेंट रहे सुखबीर सिंह यादव शहीद हो गए थे। पति की शहादत के बाद सुधा यादव राजनीति में आई थीं। 1999 में महेंद्रगढ़ लोकसभा सीट से उन्होंने कांग्रेस के वरिष्ठ नेता राव इंद्रजीत (जो अभी केंद्रीय राज्य मंत्री के पद पर हैं) को हराया था। हालांकि उसके बाद उन्हें लगातार दो लोकसभा चुनाव (महेंद्रगढ़ व गुरुग्राम लोकसभा से) में हार का सामना करना पड़ा। चुनावी हार के बावजूद भाजपा संगठन में उनकी भूमिका बनी रही। वह पार्टी के संसदीय बोर्ड में शामिल हुईं। सुषमा स्वराज के बाद यह पद संभालने वाली दूसरी महिला रही हैं। वहीं सिक्किम के राज्यपाल के तौर पर नियुक्त दुष्यंत कुमार गौतम भी हरियाणा से राज्यसभा सदस्य रहे हैं। 

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पीएम मोदी के कहने पर लड़ा था चुनाव 
हरियाणा की राजनीति में डॉ. सुधा यादव की एंट्री किसी तय राजनीतिक योजना का हिस्सा नहीं थी। वर्ष 1999 में लोकसभा चुनाव के दौरान भाजपा को महेंद्रगढ़ सीट पर कांग्रेस प्रत्याशी राव इंद्रजीत सिंह के सामने मजबूत उम्मीदवार की तलाश थी। पार्टी के कई नेताओं के नाम चर्चा में थे, लेकिन तत्कालीन प्रदेश प्रभारी नरेंद्र मोदी ने नेतृत्व के सामने सुधा यादव का नाम रखा। उस समय सुधा यादव राजनीति में आने के लिए तैयार नहीं थीं। पति को खोने के बाद सुधा यादव के सामने बच्चों की परवरिश और परिवार को संभालने की बड़ी जिम्मेदारी थी। ऐसे में चुनाव लड़ना उनकी प्राथमिकता नहीं थी। भाजपा नेताओं ने जब उनसे संपर्क किया तो उन्होंने चुनाव लड़ने से मना कर दिया। पार्टी नेतृत्व के समझाने के बाद मोदी ने उनसे फोन पर बात की और कहा कि जिस तरह परिवार को उनकी जरूरत है, उसी तरह देश को भी उनकी जरूरत है। इसके बाद सुधा यादव चुनाव लड़ने के लिए राजी हुईं।
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