गांव लाडियावाली में आयोजित कृषि शिविर में किसानों को संबोधित करते डाॅ. आरके सैनी।
भिवानी। गाल-कीट के प्रकोप ने ग्वार उत्पादक किसानों की चिंता बढ़ा दी गई। इस कीट के कारण ग्वार में फलियों की जगह गांठे अथवा मणिए बन जाते हैं, जिससे काफी नुकसान होता है। गाल-कीट एक भिरड़-ततैया जाति का कीट है, जो फूल बनने के समय ही उसमें अपने अंडे दे देता है। परिणाम स्वरूप फलियों का विकास रूक जाता है।
उक्त विचार चौ. चरणसिंह हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय हिसार के कीट विज्ञान विभाग से सेवानिवृत्त डाॅ. आरके सैनी ने व्यक्त किए। वे खंड कैरू के गांव लाडियावाली में आयोजित कृषि शिविर में किसानों को संबोधित कर रहे थे। शिविर का आयोजन कृषि एवं किसान कल्याण विभाग तथा हिंदुस्तान गम एंड केमिकल्स भिवानी ने किया।
इस कीट की रोकथाम के लिए डॉ. सैनी ने प्रति एकड़ 150 लीटर पानी में 200 मिली रोगोर 30 प्रतिशत तथा 100 मिली इमिडाक्लोप्रिड 17.8 प्रतिशत मिलाकर स्प्रे करने की सलाह दी। आवश्यकता पड़ने पर 15 दिन बाद इन्हीं दवाओं का स्प्रे दोहराया जाए।
कृषि विकास अधिकारी डाॅ. देवेंद्र कुमार ने किसानों को नरमा कपास का भरपूर उत्पादन लेने के लिए जरूरी सुझाव दिए। उन्होंने कहा कि नरमा के कीटों की दीर्घकालीन रोकथाम के लिए स्प्रे में नीम की दवा अवश्य मिलाएं। शिविर में किसानों को नरमा व ग्वार पर साहित्य कैलेंडर वितरित किए गए। इस अवसर पर 50 से अधिक किसान उपस्थित रहे।