मंदिर और भक्ति के कारण भिवानी छोटी काशी यानी शिव की नगरी के नाम से प्रसिद्ध है। यहां पर गणेश चतुर्थी भी धूमधाम से मनाई जाती है। आजादी के बाद 1948 में एक मुस्लिम परिवार पाकिस्तान चला गया। वह मूर्तियां बनाने का काम करता था, लेकिन मूर्ति बनाने की सामग्री वे भिवानी निवासी गणपत को दे गए। 73 वर्षों से गणपत का परिवार मूर्तियां बनाकर हर वर्ष छोटी काशी के लोगों को गणेश चतुर्थी पर गणपति के दर्शन कर रहा है।
मूर्तिकार गणपत तो अब इस दुनिया में नहीं है, लेकिन उनकी तीसरी पीढ़ी इस कार्य में जुटी हुई है और चौथी पीढ़ी से उनका महज 10 साल का पड़पौता हरिदर्शन भी इसी काम में अपनी रुचि दिखा रहा है। मूर्तिकार किरोड़ीमल ने बताया कि 1948 में उनके पिता गणपत को मुस्लिम समाज के लोगों ने मूर्ति बनाने का अपना काम सौंप दिया था। तब से लेकर अब तक उनकी तीन पीढ़ियां इसी काम से जुड़ी हुई हैं। उनका बेटा मनोज कुमार इस काम को संभाल रहा है और इस काम में सुनील और राजकुमार दो कारीगर उनका हाथ बंटाते हैं।
चार साल से बढ़ी गणेश की मूर्ति की मांग
बातचीत के दौरान मूर्तिकार किरोड़ीमल ने बताया कि जिले में पिछले चार-पांच साल से लोगों का गणेश चतुर्थी की तरफ अधिक रुझान हुआ है। ऐसे में पहले के मुकाबले मांग भी बढ़ी है। पहले तो गणेश चतुर्थी और दीपावली के अवसर पर अधिक से अधिक 100 से 125 मूर्तियों की ब्रिकी ही हो पाती थी। पिछले पांच साल लोग बड़े स्तर पर गणेश चतुर्थी मना रहे हैं, जिससे उनका कारोबार भी बढ़ा है। 800 से एक हजार मूर्ति गणेश चतुर्थी और दीपावली पर तो 1500 से अधिक मूर्तियों की ब्रिकी होती है। इस बार अब तक करीब 1200 मूर्तियों की ब्रिकी हो चुकी है।
पिछले साल लगी कोरोना की मार
मूर्तिकार किरोड़ीमल के बेटे मनोज कुमार ने बताया कि पिछले वर्ष कोरोना संक्रमण का अधिक खतरा था। इसकी वजह से लोगों ने मूर्तियों की खरीदारी में अधिक रुचि नहीं दिखाई। इसकी वजह से पिछली करीब 600 मूर्तियां बनी रह गईं। ऐेसे में कोरोना संक्रमण की मार उनके कार्य पर भी लग गई और उन्हें काफी आर्थिक नुकसान हुआ। इस बार काम-धंधा ठीक चल रहा है, उम्मीद है पिछली साल के नुकसान की भरपाई हो जाएगी।
मिट्टी और नारियल से बनी मूर्तियों की बढ़ी मांग
पिछले दो-तीन साल से लोगों में पर्यावरण संरक्षण को लेकर जागरूकता आई है। लोग अधिक से अधिक पौधरोपण, जल संरक्षण जैसी गतिविधियों पर ध्यान दे रहे हैं। ऐसे में वे पर्यावरण को ध्यान में रखते हुए इको फ्रेंडली मूर्तियों को अधिक खरीद रहे हैं। इको फ्रेंडली मूर्ति काली मिट्टी और नारियल से बनी होती हैं, जोकि प्रवाहित करने के बाद जल में जल्दी घुल जाती हैं। ये मूर्तियां पीओपी से बनी मूर्तियों से अधिक दाम की होती है, बावजूद इसके लोग इको फ्रेंडली को ही अधिक महत्व दे रहे हैं।
100 से अधिक डिजाइन की मूर्ति उपलब्ध
मूर्तिकार मनोज कुमार ने बताया कि उनकी दुकान पर महज 100 रुपये से लेकर आठ हजार रुपये तक की मूर्तियां उपलब्ध हैं। साथ ही दुकान पर चार इंच से लेकर पांच से छह फीट तक के साइज में मूर्तियां हैं। ये मूर्तियां 100 से अधिक डिजाइन की हैं। इसके अलावा कोई ग्राहक अगर अपनी पसंद की अलग से कोई मूर्ति बनवाना चाहता है तो पहले से पहले सूचना देनी पड़ती है। (संवाद)