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प्रकाश उत्वस आज, गुरुद्वारों में गूंजेगा वाहेगुरु... वाहेगुरु

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छावनी की संगत 19 नवंबर को देव दिवाली मनाएगी। इस शुभ अवसर पहली पातशाही श्री गुरु नानक देव जी के प्रकाश पर्व को समर्पित विशेष कथा, शब्द गायन व कीर्तन समागम आयोजित किए जाएंगे। समागम में एक तरफ इलाहीवाणी के जाप किए जाएंगे, वहीं दूसरी ओर शब्द गायन से गुरु की शिक्षाओं का गुणगान किया जाएगा।
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जिले के स्थानीय गुरुद्वारों सहित शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी के अधीन चल रहे गुरुद्वारा श्री मंजी साहिब, बादशाही बाग, सत संगत साहिब, गोबिंदपुरा साहिब, शीशगंज साहिब व श्री गुरु हरकृष्ण साहिब की चरणछौह धरती गुरुद्वारा श्री पंजोखरा साहिब में कथा-कीर्तन दरबार सजाए जाएंगे। वहीं स्थानीय प्रबंधक कमेटियों के तहत संचालित गुरुद्वारा मर्दों साहिब, लखनौर साहिब, गेंदसर साहिब भानोखेड़ी में भी समागम होंगे। सभी कमेटियों ने प्रकाश उत्सव को लेकर तैयारियां संपन्न कर ली हैं। संगत के लिए पार्किंग सहित लंगर आदि की विशेष व्यवस्था की गई है। वहीं कमेटी सदस्यों को भी जिम्मेदारी सौंपी गई है कि वह संगत की सभी सुविधाओं का ध्यान रखें। इस कार्य में प्रबंधक कमेटियों द्वारा स्थानीय प्रशासन व पुलिस का सहयोग लिया जाएगा।
केंद्रीय गुरुद्वारा गुरुपर्व कमेटी अंबाला के प्रधान सुदर्शन सिंह सहगल ने बताया कि श्री गुरु नानक देव जी किसी एक विशेष समुदाय के गुरु नहीं बल्कि पूरे संसार के गुरु हैं। उनकी शिक्षाओं का अनुसरण समाज के सभी लोग करते हैं। उन्होंने कभी जातपात व ऊंचनीच में फर्क नहीं किया। गुरु जी के प्रकाश पर्व को लेकर गोबिंद नगर गुरुद्वारे सहित अन्य सभी गुरुद्वारों को रंग-बिरंगी लड़ियों से सजाया गया है। वहीं गुरुद्वारा परिसर को भी अलग-अलग फूलों से सुशोभित किया गया है।
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गुरुद्वारा मंजी साहिब
गुरुद्वारा मंजी साहिब उस स्थान पर बनाया गया है, जहां छठे गुरु श्री गुरु हरगोबिंद साहिब जी शहर की यात्रा के दौरान ठहरे थे। यहां रहने के दौरान गुरु जी ने पानी की एक बाओली बनवाई, इसे अमृत बाओली साहिब के नाम से जाना जाता है। मान्यता है कि बाओली से जल लेने वाले श्रद्धालुओं को शारीरिक कष्टों से मुक्ति मिलती है। संगत इस पवित्र स्थान को गुरुद्वारा बाओली साहिब या गुरुद्वारा मंजी साहिब के नाम से जानती है।
बादशाही बाग
सिखों के दसवें गुरु श्री गुरु गोबिंद सिंह जी ने जिस धरती पर चिड़ियों से बाज मरवाए थे, अंबाला शहर की उस ऐतिहासिक धरती पर गुरुद्वारा बादशाही बाग बना हुआ है। यहां दुनिया भर से श्रद्धालु शीश नवाकर आशीर्वाद लेने आते हैं। यहीं से ही चिड़ियों संग बाज लड़ाऊं तभी गोबिंद सिंह नाम कहाऊं शब्द आरंभ हुआ था।
सतसंगत साहिब
दिल्ली में श्री गुरु तेग बहादुर जी की शहीदी के बाद भाई जैता सिंह गुरु जी के पावन शीश को दिल्ली के चांदनी चौक से लेकर आनंदपुर साहिब के लिए चले थे। तरावड़ी से होते हुए उन्होंने अंबाला में प्रवेश किया तो उन्होंने गुरु जी के शीश का टोकरा एक पेड़ के नीचे रखकर विश्राम किया था। यहां आज गुरुद्वारा सतसंगत साहिब बना हुआ है।
शीशगंज साहिब
कैथ माजरी में बसने वाले पीर तव्वकुल शाह ने भाई जैता को भाई राम देवा के घर ठहराया था। तब भाई राम देवा ने सारी रात श्री गुरु तेग बहादुर जी के पावन शीश का पहरा दिया। उन्होंने आनंदपुर साहिब प्रस्थान करने के उपरांत इस स्थान की उम्र भर पूजा की थी। आज इस पवित्र जगह पर गुरुद्वारा शीशगंज साहिब बनाया गया है।
गोबिंदपुरा साहिब
फगण माह की पूर्णमासी के दिन श्री गुरु गोबिंद सिंह जी अंबाला आए थे। इस दौरान उनके पास एक बाज था। गोबिंदपुरा में एक राजा का बाग था। यहां गुरु के सुंदर बाज पर जब राजा की निगाह पड़ी तो राजा ने बाज को हथियाने की योजना बनाई। लेकिन गुरु जी के आशीर्वाद से पेड़ पर बैठी चिड़ियों ने बाज को गोबिंदपुरा में ही मार गिराया। यहां इस समय गोबिंदपुरा साहिब के नाम से गुरुद्वारा बना हुआ है।
पंजोखरा साहिब
गुरुद्वारा श्री पंजोखरा साहिब आठवें गुरु श्री गुरु हरकृष्ण साहिब जी को समर्पित है। मान्यता के अनुसार एक बार श्री गुरु हरकृष्ण साहिब पंजोखरा गांव आए थे। वह यहां कई दिनों तक रहे। इस दौरान गुरु साहिब ने छज्जू नशाम के एक बहरे और गूंगे व्यक्ति को आशीर्वाद दिया और उसे पास के ही एक सरोवर में स्नान करवाया। फिर गुरु जी ने उस व्यक्ति के सिर पर एक छड़ी रखी। छड़ी रखते हुए बहरे और गूंगे व्यक्ति ने भगवद्गीता के श्लोक सुनाकर सभी को हैरान कर दिया। अब प्रत्येक रविवार को गुरुद्वारा साहिब में विशेष दीवान सजाए जाते हैं।
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