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गुजरात: हाईकोर्ट ने धर्मांतरण कानून की धारा-पांच से रोक हटाने से किया इनकार, राज्य सरकार की याचिका खारिज की

Thu, 26 Aug 2021 06:34 PM IST
अभिषेक दीक्षित न्यूज डेस्क, अमर उजाला, अहमदाबाद

सार

हाईकोर्ट ने 19 अगस्त को जमीयत उलेमा-ए-हिंद की याचिका पर पिछले हफ्ते फैसला सुनाया था। जमीयत ने इस कानून पर रोक लगाने की मांग की थी। याचिका पर फैसला देते हुए हाईकोर्ट ने इस कानून की धारा- तीन, चार, पांच और छह के संशोधनों को लागू करने पर रोक लगा दी थी।
 
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गुजरात हाईकोर्ट - फोटो : social media
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विस्तार
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गुजरात हाईकोर्ट ने नए धर्मांतरण रोधी कानून की धारा पांच पर लगी रोक को हटाने से जुड़ी राज्य सरकार की याचिका को खारिज कर दिया है। धर्म की आजादी (संशोधन) बिल 2021 की धारा पांच के तहत किसी भी व्यक्ति को धर्म से दूसरे धर्म में परिवर्तित करने के लिए धार्मिक पुजारियों को जिला मजिस्ट्रेट से अनुमति लेनी होगी। इसके अलावा जिन्होंने धर्म परिवर्तन कर लिया है, उन्हें भी एक निर्धारित प्रपत्र में जिला मजिस्ट्रेट को इसकी सुचना देनी होगी। 
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मुख्य न्यायाधीश विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति बीरेन वैष्णव की खंडपीठ ने राज्य के महाधिवक्ता कमल त्रिवेदी की दलीलें सुनने के बाद कहा कि हमें 19 अगस्त को दिए आदेश में बदलाव करने का कोई कारण नहीं मिला। महाधिवक्ता ने राज्य सरकार की ओर से पीठ को बताया कि अधिनियम की धारा 5 मूल कानून लागू होने यानी 2003 के बाद से थी और इसका विवाह से कोई लेना-देना नहीं है। उन्होंने कोर्ट को यह समझाने की कोशिश की कि धारा 5 पर रोक वास्तव में पूरे कानून पर रोक की तरह ही होगी और कोई भी धर्मांतरण से पहले अनुमति लेने के लिए अधिकारियों से संपर्क नहीं करेगा।

19 अगस्त को सुनाया था फैसला
इससे पहले गुजरात हाईकोर्ट ने 19 अगस्त को जमीयत उलेमा-ए-हिंद की याचिका पर पिछले हफ्ते फैसला सुनाया था। जमीयत ने इस कानून पर रोक लगाने की मांग की थी। याचिका पर फैसला देते हुए उच्च न्यायालय ने 19 अगस्त को अनुच्छेद 3, 4, 4ए से 4सी, 5, 6 और 6ए पर रोक लगा दी। इस दौरान अदालत ने गैरकानूनी तरीके से हुए धर्म परिवर्तन पर भी टिप्पणी की। अदालत ने कहा कि अगर एक धर्म का व्यक्ति किसी दूसरे धर्म से ताल्लुक रखने वाले से बिना जोर-जबरदस्ती, धोखाधड़ी करके या प्रलोभन देकर शादी कर लेता है तो ऐसी शादी गैरकानूनी धर्म परिवर्तन के तहत नहीं मानी जाएगी।
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जबरन धर्म परिवर्तन पर 5 साल तक की सजा
गुजरात में यह नया कानून 15 जून को अस्तित्व में आया था। इसके तहत पांच साल की सजा और अधिकतम 5 लाख रुपए के जुर्माने का प्रावधान है। इसे धार्मिक स्वतंत्रता एक्ट, 2003 में संशोधन करके लाया गया था। सरकार ने इस अधिनियम में पीड़िता के नाबालिग होने पर 7 साल तक की कैद और 3 लाख रुपए तक का जुर्माने का प्रावधान किया है। इसके साथ ही अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति की महिलाओं के खिलाफ होने वाले अपराधों के लिए भी कम से कम 7 साल की सजा का प्रावधान है।
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