वर्ष 1883 के बस्ती गजेटियर का अध्ययन करने पर पता चलता है कि कुछ वर्ष पूर्व तक व्यापारिक नावें आती जाती रहीं। इसके बाद में अनेकों नाविकों ने माना कि भुअही घाट से आगे कूड़ा और जमुआर नदियों में बड़ी नावें उतारना खतरनाक है, क्योंकि वे नदियां पतली और छिछली हैं।
ऐसे में एक विचार यह हुआ कि नेपाल से सटे मटेहना बाजार को उसका बाजार तक सड़क मार्ग से जोड़ देने पर समस्या का हल संभव है। इस बीच जमुआर नदी एक बड़ी बाधा थी, जिसे पार करने का उपाय नहीं था।
पुराने समय में चावल व्यापार से जुड़े घरानों के बुजुर्ग सदस्य बताते हैं कि बनारस के व्यापारियों ने उसका से मटेहना को सड़क मार्ग से जोड़ने के लिए जमुआर नदी पर पुल बनाने के लिए अनेक फरियादें की, सफलता नहीं मिली। बौद्ध मठों की नगरी और काला नमक की मंडी मटेहना अब बर्डपुर के मार्ग को सुगम बनाने और इस क्षेत्र को नेपाल से जोड़ने के लिए डोम राजा ने पुल निर्माण कराने की घोषणा कर दी।
यह 19वीं शताब्दी की टेक्नोलॉजी का एक बेजोड़ नमूना है। 100 फुट लंबे पुल के प्रत्येक एंगल को बड़ी कुशलता के साथ नट और बोल्ट से जोड़कर एक रेलिंग युक्त पुल का रूप दिया गया। दो दशक पूर्व नए पुल के निर्माण बाद अनुपयोगी हो गया है।