गंडक नदी की बाढ़ के चलते खेती बर्बाद हो रही थी, लिहाजा दियारा क्षेत्र के बेरोजगार नौजवान भी बेंत व खैरा की लकड़ी के अवैध कारोबार से जुड़ने लगे। इस प्राकृतिक संपदा पर कब्जे की होड़ में दियारा क्षेत्र में खूनी संघर्ष शुरू हो गया और धीरे-धीरे संगठित आपराधिक गिरोह बन गए जिन्हें आसपास के लोग जंगल पार्टी के नाम से पुकारने लगे।
जंगल डकैतों का यह गिरोह बाद में जातियों के गिरोह के रूप में भी तब्दील हो गया। दियारा की उपजाऊ जमीन पर कब्जा व किसानों से लेवी (गुंडा टेक्स) वसूलने, वन संपदा कि तस्करी के इस काम में जुटे जंगल डकैत आम लोगों को इस क्षेत्र से दूर रखने के लिए खौफनाक वारदातों को अंजाम देने लगे।
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गंडक नदी के दोनों तरफ करीब 100 किलोमीटर की लंबाई व 10 किलोमीटर की चौड़ाई में हजारों किसानों की खेती है। बाढ़ के चलते उपजाऊ हुई इस मिट्टी में धान व गन्ना की खेती होती है। किसान अपने खेत में फसल बोकर तैयार करता था लेकिन जब काटने का वक्त आता था तो जंगल डकैत खेत पर कब्जा कर लेते थे।
किसान गन्ना गिराकर एक तिहाई हिस्सा इन जंगल डकैतों को देते थे। कभी-कभी तो पूरी फसल पर ही उनका कब्जा हो जाता था। गन्ने के खेत में छिपे बदमाशों के लिए भोजन का प्रबंध भी किसान को ही करना पड़ता था।
लोग बताते हैं कि उस दौर में जंगल डकैत जब किसी को फिरौती के लिए चिट्ठी लिखते थे तो उस पर अपने डकैत गैंग के सरगना के नाम के आगे सरकार शब्द तो जोड़ते ही थे, राइफल की गोली के पिछले हिस्से का निशान भी लगाते थे। फिरौती की रकम या सामान नहीं पहुंचाने पर अपहरण व हत्या की घटनाएं होती थीं।
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डकैतों को नेपाल में मिलती थी शरण
कुख्यात जंगल डकैत राधा यादव, चुम्मन यादव, रूदल यादव , रामयाशी भगत, मुरारी भगत, रामचन्द्र चौधरी, लोहा मल्लाह आदि तमाम डकैत सरगना नेपाल के नवल परासी जिला के थाना बेलाटाड़ी के सखुअनवा व रानीगंज में घर बनाकर रहते थे। यूपी पुलिस जानकारी के बाद भी इन डकैतों को गिरफ्तार नहीं कर पाती थी।