पहचान नहीं होने से खपाने में होती है आसानी
एक ही कंपनी भारत और नेपाल दोनों जगहों के लिए उत्पाद तैयार करती है। कई भारतीय कंपनियों की फैक्ट्री नेपाल में चलती हैं। वहां पर उसका रेट अलग होता है। लेकिन, वहां के तय भाव से यहां एमआरपी पर उसी सामान की खरीद की जाती। ऐसे में पहचान होने में मुश्किल होने के साथ अधिक रुपये भी मिल जाते। नेपाल से लाए ये सामान घंटाघर, शाहमारूफ, साहबगंज, पांडेयहाता सहित कई जगहों पर बिकते हैं।
इन सामान की तस्करी ज्यादा
नेल पेंट, लिपिस्टिक, क्रीम, लेडीज अंडरगारमेंट्स, लाइट्स, हैंडवाच, खिलौने, इलेक्ट्रानिक खिलौने, डियो और परफ्यूम सहित अन्य सामान।
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जीएसटी अगर दिखाती सख्ती तो कसता नकेल
वस्तु एवं सेवाकर (जीएसटी) के तहत ही ये सामान और इनके स्टॉकिस्ट व थोक व्यापारी आते हैं। जीएसटी के मोबाइल सेक्टर की जिम्मेदारी होती है कि ट्रांसपोर्ट होने वाले सामान की जांच करें और उन्हें नियमानुसार क्रय- विक्रय नहीं करने पर जुर्माना लगाएं। लेकिन टीम की सुस्ती और निष्क्रियता का असर है कि ये व्यापारी काली कमाई भी करते हैं और लोगों को असली के चक्कर में नकली माल भी पकड़ा देते।
ग्रेड वन एडिश्नल कमिश्नर विमल कुमार राय ने कहा कि गोपनीय तरीके से इन व्यापारियों पर भी निगरानी की जाएगी। कुछ बिंदुओं पर अपनी टीम को सलाह दी जाएगी। व्यापारियों को नियमानुसार जीएसटी में जमा करनी चाहिए। चोरी करने पर पकड़े जाने पर अतिरिक्त जुर्माना भी भरना होता है।
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