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गोरखपुर लिटरेरी फेस्ट: राज्यसभा सदस्य मनोज झा ने कहा- कोरोना संकट में सांसद हो गए थे बेचारे

Sun, 19 Dec 2021 03:00 PM IST
vivek shukla अमर उजाला ब्यूरो, गोरखपुर।

सार

वाद-विवाद का मंच प्रश्नोत्तरी में तब्दील हुआ, प्रो. हर्ष सिन्हा ने पूछे दिलचस्प सवाल। राज्यसभा सदस्य मनोज झा राजनीति सत्र में सियासत, शराफत, शरारत पर खुल कर बोले।
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गोरखपुर लिटरेरी फेस्ट - फोटो : अमर उजाला।
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विस्तार
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गोरखपुर लिटरेरी फेस्ट के राजनीति सत्र में राज्यसभा सदस्य मनोज झा ने सियासत, शराफत, शरारत विषय पर बेबाक विचार रखे। उनसे जब कोरोना संकट से जुड़ा एक सवाल पूछा गया तो उन्होंने जनप्रतिनिधियों का दर्द बयां की। कहा-कोरोना काल में सांसद से ज्यादा बेचारा कोई नहीं था। सत्र और भी दिलचस्प होता, यदि उनके साथ राज्यसभा सदस्य, भाजपा प्रवक्ता सुधांशु त्रिवेदी भी मंच साझा करते। लेकिन, वह किसी कारण नहीं आ सके। उनकी अनुपस्थिति में प्रो. हर्ष सिन्हा ने सवाल पूछने की जिम्मेदारी संभाली। सत्र का आरंभ सुधांशु त्रिवेदी के वीडियो संदेश के साथ हुआ। उन्होंने गोरखपुर लिटरेरी फेस्ट में किसी कारण नहीं पहुंचने का खेद व्यक्त करते हुए सभी को शुभकामनाएं दीं।
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सवाल- कोरोना काल की बेचारगी ने परेशान किया क्या?
जवाब-
लोगों को लगता है कि सांसद है सब करा देगा, लेकिन कोरोना संकट के दौरान सांसद से बेचारा कोई नहीं था। पूरे दिन में दो लोगों को ऑक्सीजन नहीं दिला पाते थे। कोरोना के कारण दो करीबियों की मृत्यु हुई तो मन कचोट गया। वह भाषण नहीं मेरे मन के जज्बात थे, जो मैंने सदन में रखे थे।

सवाल: क्या पहले के मुकाबले राजनीति में शालीनता कम या समाप्त हो गई है?
जवाब-
ऐसा नहीं है। संसद में विपरीत विचारधारा के लोग भी एक दूसरे से परिवार की तरह जुड़े रहे हैं। लेकिन आज की राजनीति प्रतिस्पर्धा की जगह युद्ध वाली हो गई है। इस राजनीति से जीवन इतना दूषित और कलुषित हो गया है कि सांस लेने में भी कठिनाई हो रही है। बावजूद इसके, संसद में रिश्तों की डोर बंधी हुई है। संवाद बहुत आवश्यक है। संवाद नहीं होगा तब आप विवाद देखेंगे। मुझे कष्ट होता है कि जवाहर लाल नेहरू का विरोध क्यों होता है। आप कांग्रेस के विरोधी हो सकते हैं, लेकिन प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के नहीं। पुराने लोगों में अच्छाइयां-बुराइयां दोनों थीं लेकिन जो हिंद देश के थे, उनका अस्तित्व खत्म नहीं किया जा सकता।
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सवाल: राजनीति में आक्रामकता की वजह क्या है?
जवाब-
जब मैं आरजेडी का प्रवक्ता बना तो लोगों ने कहा कि यह आक्रामक नहीं है। हमारे समाज में अग्रेशन यानी आक्रोश और विवाद ज्यादा पसंद किए जा रहे हैं, मेलमिलाप की बात करने वाले खारिज हो रहे हैं। जो जितना जहर उगले उसकी उतनी उपयोगिता है, और अमृत का व्यापार करने वाले किनारे बैठे हैं। जिस समाज को आक्रोश सिखाया जाता है वह समाज मानसिक बीमारी का शिकार होता है। केवल राजनीति ही नहीं, बल्कि समाज को भी सोचना होगा कि वह आज गुस्से को इतना क्यों पसंद कर रहा है।
 
सवाल: राजनीतिक दल के तौर पर राजद ही क्यों चुनीं?
जवाब-
(हंसते हुए) यह प्रश्न हर जगह पूछा जाता है। भूतपूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के लिए भी लोग कहते थे- राइट मैन इन रांग पार्टी। राजनीति में आने के समय सेकुलरिज्म और सांविधानिक मूल्य ही प्राथमिकता थी। मिथिला से आता हूं। मुझे जय श्रीराम की जगह जय सियाराम ज्यादा अच्छा लगता है। बिहार के जिस इलाके से आता हूं, वहां 1980 के दशक से पहले  शिव मंदिर मिलते थे, राम मंदिर नहीं। भारतीय बहुलवाद, अनेकता और धर्मनिरपेक्षता को नजर में रख कर राजद का दामन थामा।

सवाल: युवाओं को क्या नसीहत देंगे?
जवाब-
युवाओं से आग्रह करूंगा कि किसी भी चीज, बयान, भाषण को स्वीकार करने, उसको मानने से पहले उस पर शक करिए। उस पर प्रश्न करिए, उसके नजरिए को देखिए और किस मतलब से कहा गया है, इसे तलाशिए। संविधानिक सरोकारों से समझौता नहीं होना चाहिए। कोई भी ऐसी विचारधारा जिसमें अतिवाद है, वह ज्यादा समय तक अस्तित्व में नहीं रह सकती।
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वर्तमान समय में चुनौतियों से जूझ रहा रंगमंच : संजय उपाध्याय

वरिष्ठ रंगकर्मी संजय उपाध्याय ने कहा कि वर्तमान समय में रंगमंच चुनौतियों से जूझ रहा है। रंगमंच के समक्ष रचनाशीलता बनाम तकनीक का प्रश्न खड़ा है।
वह शनिवार को गोरखपुर लिटरेरी फेस्ट के नाट्य सत्र में ‘सिनेमा और थियेटर : मौलिकता और रचनाशीलता का खुला कैनवस’ विषय पर विचार रख रहे थे। उन्होंने कहा कि रंगमंच की वास्तविक पहचान ही उसकी मौलिकता है। नवाचार के प्रयोग से ही रंगमंच समृद्ध होता है। हालांकि कुछ स्थापित परंपराओं को तोड़ना किसी भी दृष्टि से उचित नहीं, पर अगर हालात मांग करते हों तो रंगमंच को कभी किसी परिपाटी के सख्त दायरे में नहीं बांधना चाहिए।

ऑनलाइन उपस्थिति दर्ज करवा रहा है रंगमंच

बॉलीवुड स्क्रिप्ट राइटर अनुराधा तिवारी ने रंगमंच की वर्तमान परिस्थितियों में ढलने के सवाल पर कहा कि रंगमंच भी हाल के दिनों में अपनी ऑनलाइन उपस्थिति दर्ज करवा रहा है। भूमंडलीकरण के दौर में रंगमंच के सामने अपने दायरे को बढ़ाने की असीमित संभावनाएं हैं। उन्होंने कहा कि भाषाई संकल्पना और कथानक में प्रयोगधर्मिता का बढ़ता चलन सुखकारी है, इसे प्रोत्साहित किया जाना चाहिए।

मंच पर जीवंत हुआ ‘बिदेशिया’

गोरखपुर लिटरेरी फेस्ट के पहले दिन शनिवार की शाम होटल क्लार्क में संस्था भाई की ओर से नाटक ‘बिदेशिया’ का मंचन किया गया। स्थानीय कलाकारों ने अपने अभिनय से नाटक के प्रत्येक चरित्र को जीवंत कर दिया।
नाटक में पलायन के उस दंश को दिखाया गया है, जिससे न जाने कितनी महिलाएं पीड़ित हैं। नाटक में पूर्वांचल से जुड़े भोजपुरी गीतों का इस्तेमाल किया गया है। नाटक की परिकल्पना और निर्देशन मानवेंद्र त्रिपाठी और संगीत राकेश श्रीवास्तव ने दिया।
इन्होंने किया अभिनय: पिंटू प्रीतम, विभा सिंह, पवन पंछी, साधना चतुर्वेदी, नवीन तिवारी, आकांक्षा, प्रदीप सिंह, बंटी, सोमनाथ, अहमद अली, सुमित सिंह, स्वीटी सिंह, अर्पिता सिंह, कनिष्का, अविका श्रीवास्तव, श्वेता वर्मा, निशा, अंशिका सिंह, प्रभा आनंद, रुपसज्जा-राधेश्याम।
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