गोरखपुर लिटरेरी फेस्ट के राजनीति सत्र में राज्यसभा सदस्य मनोज झा ने सियासत, शराफत, शरारत विषय पर बेबाक विचार रखे। उनसे जब कोरोना संकट से जुड़ा एक सवाल पूछा गया तो उन्होंने जनप्रतिनिधियों का दर्द बयां की। कहा-कोरोना काल में सांसद से ज्यादा बेचारा कोई नहीं था। सत्र और भी दिलचस्प होता, यदि उनके साथ राज्यसभा सदस्य, भाजपा प्रवक्ता सुधांशु त्रिवेदी भी मंच साझा करते। लेकिन, वह किसी कारण नहीं आ सके। उनकी अनुपस्थिति में प्रो. हर्ष सिन्हा ने सवाल पूछने की जिम्मेदारी संभाली। सत्र का आरंभ सुधांशु त्रिवेदी के वीडियो संदेश के साथ हुआ। उन्होंने गोरखपुर लिटरेरी फेस्ट में किसी कारण नहीं पहुंचने का खेद व्यक्त करते हुए सभी को शुभकामनाएं दीं।
सवाल- कोरोना काल की बेचारगी ने परेशान किया क्या?
जवाब- लोगों को लगता है कि सांसद है सब करा देगा, लेकिन कोरोना संकट के दौरान सांसद से बेचारा कोई नहीं था। पूरे दिन में दो लोगों को ऑक्सीजन नहीं दिला पाते थे। कोरोना के कारण दो करीबियों की मृत्यु हुई तो मन कचोट गया। वह भाषण नहीं मेरे मन के जज्बात थे, जो मैंने सदन में रखे थे।
सवाल: क्या पहले के मुकाबले राजनीति में शालीनता कम या समाप्त हो गई है?
जवाब- ऐसा नहीं है। संसद में विपरीत विचारधारा के लोग भी एक दूसरे से परिवार की तरह जुड़े रहे हैं। लेकिन आज की राजनीति प्रतिस्पर्धा की जगह युद्ध वाली हो गई है। इस राजनीति से जीवन इतना दूषित और कलुषित हो गया है कि सांस लेने में भी कठिनाई हो रही है। बावजूद इसके, संसद में रिश्तों की डोर बंधी हुई है। संवाद बहुत आवश्यक है। संवाद नहीं होगा तब आप विवाद देखेंगे। मुझे कष्ट होता है कि जवाहर लाल नेहरू का विरोध क्यों होता है। आप कांग्रेस के विरोधी हो सकते हैं, लेकिन प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के नहीं। पुराने लोगों में अच्छाइयां-बुराइयां दोनों थीं लेकिन जो हिंद देश के थे, उनका अस्तित्व खत्म नहीं किया जा सकता।
सवाल: राजनीति में आक्रामकता की वजह क्या है?
जवाब- जब मैं आरजेडी का प्रवक्ता बना तो लोगों ने कहा कि यह आक्रामक नहीं है। हमारे समाज में अग्रेशन यानी आक्रोश और विवाद ज्यादा पसंद किए जा रहे हैं, मेलमिलाप की बात करने वाले खारिज हो रहे हैं। जो जितना जहर उगले उसकी उतनी उपयोगिता है, और अमृत का व्यापार करने वाले किनारे बैठे हैं। जिस समाज को आक्रोश सिखाया जाता है वह समाज मानसिक बीमारी का शिकार होता है। केवल राजनीति ही नहीं, बल्कि समाज को भी सोचना होगा कि वह आज गुस्से को इतना क्यों पसंद कर रहा है।
सवाल: राजनीतिक दल के तौर पर राजद ही क्यों चुनीं?
जवाब- (हंसते हुए) यह प्रश्न हर जगह पूछा जाता है। भूतपूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के लिए भी लोग कहते थे- राइट मैन इन रांग पार्टी। राजनीति में आने के समय सेकुलरिज्म और सांविधानिक मूल्य ही प्राथमिकता थी। मिथिला से आता हूं। मुझे जय श्रीराम की जगह जय सियाराम ज्यादा अच्छा लगता है। बिहार के जिस इलाके से आता हूं, वहां 1980 के दशक से पहले शिव मंदिर मिलते थे, राम मंदिर नहीं। भारतीय बहुलवाद, अनेकता और धर्मनिरपेक्षता को नजर में रख कर राजद का दामन थामा।
सवाल: युवाओं को क्या नसीहत देंगे?
जवाब- युवाओं से आग्रह करूंगा कि किसी भी चीज, बयान, भाषण को स्वीकार करने, उसको मानने से पहले उस पर शक करिए। उस पर प्रश्न करिए, उसके नजरिए को देखिए और किस मतलब से कहा गया है, इसे तलाशिए। संविधानिक सरोकारों से समझौता नहीं होना चाहिए। कोई भी ऐसी विचारधारा जिसमें अतिवाद है, वह ज्यादा समय तक अस्तित्व में नहीं रह सकती।