पॉलीमर वे पदार्थ हैं, जिनके अणु आकार में बहुत बड़े होते हैं। सरल अणुओं या मोनोमर से मिलकर बने होते हैं। सेल्यूलोज, लकड़ी, रेशम, त्वचा, रबर आदि प्राकृतिक पॉलीमर हैं, ये खुली अवस्था में प्रकृति में पाए जाते हैं। इन्हें पौधों और जीवधारियों से प्राप्त किया जाता है।
मदन मोहन मालवीय प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय (एमएमएमयूटी) के शोधार्थियों ने हाईड्रोजेन नामक एक ऐसा पॉलीमर (बहुलक) विकसित किया है, जो खेती-किसानी और दवाओं के लिए संजीवनी साबित होगा। इसके मिश्रण से दवाओं की क्षमता सात दिनों तक बढ़ जाएगी, साथ ही अगर इसे खाद के साथ मिला दिया जाएगा तो मिट्टी में नमी ज्यादा दिनों तक बनी रहेगी। इस शोध को अब पेटेंट कराने की प्रक्रिया शुरू कर दी गई है।
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एमएमएमयटी के रसायन एवं पर्यावरण विज्ञान विभाग के सहायक आचार्य डॉ. कृष्ण कुमार के निर्देशन में शोधार्थी किरन, विनय सिंह और शैलजा सिंह ने इस पॉलीमर को विकसित किया है। करीब दो साल के अथक प्रयास के बाद इस टीम को कामयाबी हासिल हुई है।
डॉ कृष्ण कुमार के मुताबिक पॉलीमर पानी को अवशोषित कर लेता है और धीरे-धीरे रिलीज करता रहता है। इसी तरह दवाओं के मामले में भी जिस मर्ज की दवा है उसे टारगेट करके शरीर में वहां तक पहुंचाता है जहां उसकी जरूरत होती है। डॉ कुमार ने बताया कि एक पॉलीमर का तीन बार पुन: उपयोग किया जा सकेगा। उनका शोध से अंतरराष्ट्रीय जर्नल में प्रकाशित हो चुका है।
ऐसे होगी बचत
डॉ कुमार ने बताया कि आमतौर पर खाद का छिड़काव करने के बाद किसानों को बार-बार सिंचाई करनी पड़ती है। इससे खेती की लागत बढ़ जाती है। अगर पॉलीमर की सहायता से खाद का छिड़काव किया जाए तो खेत में नमी लंबे समय तक बनी रहेगी। किसान को सिंचाई करने की जरूरत नहीं पड़ेगी। इसी प्रकार जो दवा किसी मनुष्य को 24 घंटे में एक या दो बार दी जाती है, उसे पॉलीमर में इंजेक्ट करके दिया जाए तो उसका प्रभाव लगभग सात दिनों तक बना रहेगा।
क्या होता है पॉलीमर
पॉलीमर वे पदार्थ हैं, जिनके अणु आकार में बहुत बड़े होते हैं। सरल अणुओं या मोनोमर से मिलकर बने होते हैं। सेल्यूलोज, लकड़ी, रेशम, त्वचा, रबर आदि प्राकृतिक पॉलीमर हैं, ये खुली अवस्था में प्रकृति में पाए जाते हैं। इन्हें पौधों और जीवधारियों से प्राप्त किया जाता है।