केंद्र की मोदी सरकार ने गुरुनानक जयंती पर तीनों कृषि कानूनों को वापस ले लिया। सरकार ने किसानों को समझा पाने में खुद को फेल बताया। कृषि कानूनों को वापस लेने की घोषणा के बाद अमर उजाला ने किसान संगठन भाकियू के नेताओं से बातचीत की।
किसान नेताओं ने कहा कि किसानों की कुर्बानी के चलते यह बिल वापस हुआ है। संगठन किसानों के हित को सर्वोपरि मानती है। सरकार मानी, मगर सात सौ किसानों को इसके लिए खुद का बलिदान देना पड़ा।
भाकियू के प्रदेश सचिव दिव न चंद्र पटेल ने कहा कि सरकार ने अपने हठ के चलते किसानों के शोषण वाले कृषि बिल को वापस लेने का निर्णय लेने में एक वर्ष लगा दिया। ऐसे में तमाम किसानों को आंदोलन में शहीद होना पड़ा। किसानों पर लाठियां चलीं, मगर किसान अपने हित को लेकर जाग उठा है। आखिरकार किसानों की जीत हुई और सरकार झुकी।
संगठन के जिलाध्यक्ष जयराम चौधरी ने कहा कि किसानों के लिए यह खुशी का पल है, जब उसकी मांग को सरकार ने मान लिया। यदि कृषि कानून लागू हो जाता तो निश्चित तौर पर कृषि पर पूंजीपतियों का अधिकार होता और किसान बंधुआ मजदूर बनकर रह जाते। कहा यदि सरकार किसानों का भला ही चाहती है तो उनके पक्ष में कोई ऐसा कानून बना दिया जाए, जिससे किसान अपने उपज की कीमत तय करने का अधिकार पा ले।
मंडल महासचिव शोभाराम ठाकुर ने कहा कि किसान बिल के विरोध में 26 नवंबर 2020 को आंदोलन शुरू हुआ। अब करीब एक सप्ताह बाद आंदोलन की बरसी है। इससे पहले सरकार चेत गई। यदि किसान बिल वापस न होता तो अभी आंदोलन और लंबा खिंच जाता। सरकार ने किसान हित में यह फैसला लिया है। अब केवल एमएसपी का कानून लागू हो जाए तो किसान की ताकत बढ़ जाएगी।
जिला महासचिव डॉ. आरपी चौधरी ने कहा कि सरकार का फैसला उचित है। यह निर्णय सरकार को पहले ही करना चाहिए था, मगर देर सही दुरुस्त निर्णय हुआ है। डॉ. चौधरी ने कहा कि किसानों के हित में जो फैसला लेना चाहिए वह सरकार नहीं ले रही है, बल्कि कृषि कानून बिल लाकर सरकार किसानों को बंधुआ मजदूर बना देना चाहती थी। यह सरकार की नहीं बल्कि किसानों के बलिदान का परिणाम है कि सरकार को किसानों की मांगों के सामने झुकना पड़ा।