महिला अस्पताल के एसआईसी डॉ आनंद श्रीवास्तव ने बताया कि आम दिनों की अपेक्षा लॉकडाउन के दौरान जिला अस्पताल में प्रसव के मामले कम आए। गांव में पुराने तरीके से दाइयों ने डिलीवरी कराई है। जिला अस्पताल में पहली प्राथमिकता नॉर्मल डिलीवरी की होती है। जरूरत पर ही सिजेरियन कराई जाती है।
सीजेरियन के पीछे कहीं यह तो नहीं वजह
निजी अस्पतालों की बात करें तो सिजेरियन डिलीवरी के नाम पर 15 हजार से लेकर 70 हजार रुपये तक लिए जाते हैं। बड़े अस्पतालों का खर्चा तो एक लाख रुपये तक पहुंच जाता है।
- महिला अस्पताल में लॉकडाउन के दौरान नॉर्मल और सिजेरियन डिलीवरी के आंकड़े
- लॉकडाउन पार्ट-वन (24 मार्च से 13 अप्रैल) में नॉर्मल डिलीवरी 208, सिजेरियन-97
- लॉकडाउन पार्ट-टू(14 अप्रैल से 03 मई) में नॉर्मल डिलीवरी 173, सिजेरियन-77
- लॉकडाउन पार्ट-थ्री(चार से 17 मई) में नॉर्मल डिलीवरी 137, सिजेरियन-64
- लॉकडाउन पार्ट-चार(18 मई से 31 मई) में नॉर्मल डिलीवरी 109, सिजेरियन-69
- 24 मार्च से 31 मई के बीच कुल नॉर्मल डिलीवरी 642, सिजेरियन-308
आईएमए अध्यक्ष डॉ एससी कौशिक ने कहा कि निजी अस्पताल में आने वाले डिलीवरी के केस पर निर्भर होता है उसकी स्थिति नॉर्मल की है या सिजेरियन की। उसी अनुसार डॉक्टर प्रसव कराता है। लॉकडाउन में पब्लिक ट्रांसपोर्ट नहीं मिला। इसकी वजह से केस निजी अस्पताल तक नहीं आए। ऐसे में सही आंकड़े कुछ समय बाद ही पता चल सकेंगे।