डॉ. अशफाक अहमद, फर्रुख जमाल व मुफ्ती मो. अजहर शम्सी।
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मुस्लिम युवक-युवतियों के गैर मुस्लिमों से निकाह को शरीअत की नजर में नाजायज होने के मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के फैसले को गोरखपुर शहर का संभ्रांत मुस्लिम समाज और उलेमा भी जायज ठहरा रहे हैं। उलेमाओं को यह इसलिए नाजायज लगता है कि इससे शरीअत की व्यवस्था बिगड़ती है, जबकि बुद्धिजीवी वर्ग इस तरह की शादी से भविष्य में पैदा होने वाली सामाजिक जटिलताओं के प्रति चिंतित नजर आया। मालूम हो कि ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के कार्यवाहक महासचिव मौलाना खालिद सैफुल्लाह रहमानी ने बृहस्पतिवार को इस संबंध में बयान जारी किया था। उनके मुताबिक मुस्लिम लड़कों को मुस्लिम लड़कियों से ही निकाह करना चाहिए। मुस्लिम लड़के या लड़की की किसी मुशरिक (ईश्वर के सापेक्ष दूसरे को शरीक करने वाला) से निकाह शरीअत के अनुसार वैध नहीं है।
नायब काजी मुफ्ती मो. अजहर शम्सी ने बताया कि शरीअत इस्लाम के अनुयायियों के लिए जीवन जीने की गाइडलाइन है। शरीअत में साफ किया गया है कि मुस्लिम लड़के या लड़की को मुस्लिम लड़की या लड़के से ही निकाह करना चाहिए।
लेखक फर्रुख जमाल ने बताया कि बात मुस्लिम-गैर मुस्लिम की नहीं है। दो धर्म के अनुयायियों के बीच होने वाले विवाह में सामाजिक जटिलताएं बहुत होती हैं। भारतीय समाज धार्मिक-सांस्कृतिक परंपराओं से जुड़ा है। इस तरह के विवाह तो आसानी से हो जाते हैं, लेकिन इसका खामियाजा उनकी संतानों को भुगतना पड़ता है। इन संतानों के लिए रिश्ते मिलना मुश्किल होता है।
डॉ. अशफाक अहमद उमर ने बताया कि शरीअत अपनी जगह है, अभी भारतीय कानून में दो धर्म युवक-युवतियों के अधिकारों के बारे में कुछ तय नहीं है। हिंदू लॉ के अनुसार यदि किसी हिंदू युवक से किसी मुस्लिम लड़की का विवाह होता है तो पति की मौत होने पर उस लड़की का ससुराल की संपत्ति पर कोई अधिकार नहीं रह जाएगा। सभी धर्म में अच्छे लड़के लड़कियां हैं, बेहतर है कि अपने ही धर्म में शादी या निकाह किया जाए।