नगर निगम की जमीनों पर कब्जा का खेल सबसे पहले 2012 में सामने आया था। तब पता चला कि इस पूरे खेल में कर्मचारियों का एक गिरोह काम करता है और उसमें से ही एक कर्मचारी ने नगर निगम की करोड़ों रुपयों की संपत्ति पर कब्जा जमा लिया है।
दुकान और मकान सब निगम की जमीन पर कब्जा कर बनाए जाने के बाद सख्ती की गई, लेकिन कर्मचारियों के विरोध के आगे नगर निगम प्रशासन बैकफुट पर आ गया था। विभाग के सूत्रों के मुताबिक इसके बाद ही धंधेबाज कर्मचारियों का मनोबल बढ़ गया।
यह वही गिरोह है, जो दूसरे के मकान पर नंबर चढ़ा देने, टैक्स जमा कर देने तक का खेल करता है। उस समय से शुरू हुआ सिलसिला आगे और तेजी से बढ़ा। अब इसकी पोल तब खुली जब पुलिस ने माफिया पर कार्रवाई शुरू की। अजीत शाही पर कार्रवाई के दौरान निगम की सच्चाई सामने आई।
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अब नगर आयुक्त ने सख्ती की तो पता चला कि कई जमीनों पर कब्जा है। पिछले तीन महीने में 21 एकड़ जमीन खाली कराई गई है। सख्ती का ही असर है कि कई और जमीनों को भी नगर निगम ने अब अपना बताना शुरू कर दिया है और उसके दस्तावेज बाहर आ गए हैं। लेकिन, यह भी सच है कि इन घुटे कर्मचारियों से उन जमीनों के दस्तावेज निकलवाना टेड़ी खीर है, जिसे माफिया अजीत शाही जैसे लोगों ने अपना या अपने सगे संबंधियों के नाम पर अंकित करवा दिया है।
पार्क में या फिर पेड़ के नीचे भवन में होता था सौदा
जानकार बताते हैं, अभी चार साल पहले तक यह काम तेजी से चला है। इसके लिए पुराने कर्मचारी अपने लोगों से कार्यालय में बातचीत नहीं करते थे। ऊपर के तल से बाबू नीचे आते थे और सामने पार्क के चबूतरे या फिर पेड़ के नीचे चाय की दुकान के पास के भवन में बैठकर सौदा तय करते थे। कोशिश यही होती थी कि इसकी भनक किसी को न लगने पाए। हुआ भी यही था, अब निगम के इस पुराने खेल का कितना सच सामने आएगा, यह आने वाले समय में ही तय हो पाएगा।
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