पूर्वांचल की बड़ी मंडियों में शुमार महेवा स्थित फलमंडी के 10 हजार लोगों के समक्ष पेयजल संकट से जूझ रहे हैं। यहां करीब दो महीने से पानी की सप्लाई ठप है। गल्ला मंडी में स्थित बोरिंग के बैठ जाने के कारण सप्लाई ही नहीं हो रही है। मछली मंडी स्थित वैकल्पिक बोरिंग को राहत के लिए कुछ घंटे चलाया तो जा रहा है लेकिन यह नाकाफी है। उससे सिर्फ मछली मंडी में ही सप्लाई हो पा रही है और गंदा पानी भी आता है।
नवीन मंडी के व्यापारियों का कहना है कि मंडी में एक हैंडपंप है। वह भी करीब सौ मीटर दूरी पर है। मजबूरी में दिन में कई बार बाल्टी से पानी भरकर लाना पड़ता है। बताया कि आलू मंडी में एक ही नल होने के कारण यहां लोगों की लाइन लगी रहती है। मंडी के अन्य हिस्सों में भी यहीं हाल है। ठेले वाले, पल्लेदार और बाहर से आए लोगों के पास उमस भरी गर्मी में नल का पानी पीने के अलावा और कोई विकल्प नहीं है।
दस हजार लोग प्रतिदिन पहुंचते हैं
महेवा मंडी में हर दिन औसतन 10 हजार लोग पहुंचते हैं। आलू-प्याज मंडी, सब्जी-फल मंडी, गल्ला मंडी और मछली मंडी मिलाकर करीब एक हजार दुकानें हैं। हर दुकान पर आढ़ती के साथ ही दो-तीन पल्लेदार भी रहते हैं। महेवा मंडी में सैकड़ों गाड़ियां प्रतिदिन विभिन्न जगहों से सामान लेकर आती हैं। इसके अलावा थोक व खुदरा व्यापारी भी पहुंचते हैं। उन्हेें पानी के लिए भटकना पड़ता है।
अध्यक्ष फल सब्जी विक्रेता एसोसिएशन अवध गुप्ता ने बताया कि मंडी में बजट के अभाव की वजह से नई बोरिंग का काम अटका पड़ा हुआ है। इसे बनाने के लिए करीब 20 लाख रुपये की जरूरत है। लेकिन इसमें अभी भी समय लग रहा है। मंडी प्रशासन का दावा है कि मछली मंडी की वैकल्पिक बोरिंग से सप्लाई पहले की तरह सामान्य कर दी गई है। वहीं आढ़तियों का कहना है कि नई बोरिंग के बिना यह संभव ही नहीं है।
पल्लेदार, ठेले वाले, ट्रांसपोर्ट वाले टोटी का ही पानी पीते हैं। नहाना, खाना, बर्तन और कपड़े धोना भी उसी पानी से होता है। बोरिंग बैठ जाने से दिक्कत हो रही है।
मंडी डीडीई रविंद्र कुमार सिंह ने बताया कि नई बोरिंग के लिए प्रस्ताव पहले ही भेजा गया है। उसकी स्वीकृति मिल चुकी है। टेंडर प्रक्रिया चल रही है। जल्द ही मंडी में बोरिंग का काम शुरू कर दिया जाएगा।