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गोरखपुर: इस तकनीकी से कैंसर रोगियों को मिलेगी राहत, स्विटजरलैंड से आई है 18 करोड़ की मशीन

Fri, 13 Aug 2021 01:58 PM IST
vivek shukla अमर उजाला नेटवर्क, गोरखपुर।

सार

रेडिएशन के दुष्प्रभाव होंगे कम। हनुमान प्रसाद पोद्दार कैंसर अस्पताल एवं शोध संस्थान ने शासन के सहयोग से मंगाई है मशीन। 18 करोड़ की मशीन 120 दिनों के अंदर हुई इंस्टाल।

 
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : अमर उजाला।
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विस्तार
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कैंसर रोगियों पर रेडिएशन का दुष्प्रभाव कम होने से उन्हें जल्द ही राहत मिलेगी। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ 14 अगस्त को गोरखपुर के हनुमान प्रसाद पोद्दार कैंसर अस्पताल एवं शोध संस्थान में ऐसे मरीजों के इलाज के लिए लगाई गई रेडियोथेरेपी विभाग में हाई एंड मल्टीपल एनर्जी लीनियर एक्सीलेटर वेरियन ट्रूबीम मशीन का उद्घाटन करेंगे। डीएम विजय किरण आनंद ने मुख्यमंत्री के कार्यक्रम के संबंध में गुरुवार को संस्थान का निरीक्षण कर तैयारियों का जायजा भी लिया है।
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इस मशीन से मरीजों को रेडिएशन से होने वाले साइड-इफेक्ट बहुत कम झेलने पड़ेंगे। यह मशीन सीधे ग्रस्त सेल्स को टारगेट करती है। इससे सामान्य सेल पर रेडिएशन का बुरा असर नहीं पड़ेगा। 18 करोड़ रुपये की यह मशीन स्विटजरलैंड से आई है। हनुमान प्रसाद पोद्दार कैंसर हॉस्पिटल के संयुक्त सचिव रसेंदु फोगला ने बताया कि सरकार की ओर से भी इस मशीन को खरीदने में काफी मदद की गई है। साढ़े आठ करोड़ रुपये का अनुदान मशीन के लिए शासन की ओर से दिया गया है। इसके लिए मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का विशेष आभार है। उनके प्रयास से यह सब संभव हुआ है।
 
ऐसे होता है इलाज
हाई एंड मल्टीपल एनर्जी लीनियर एक्सीलेटर वेरियन ट्रूबीम मशीन से सीधे ट्यूमर वाले हिस्से पर रेडिएशन डाला जाता है जो दूसरे सेल को खत्म करने के बजाय केवल सेल को खत्म करता है। इसमें दूसरी मशीनों के मुकाबले ज्यादा रेडिएशन निकलता है। इसी कारण इसे चलाने के दौरान रेडिएशन ऑन्कोलॉजिस्ट का होना जरूरी है। इससे मरीजों में साइड इफेक्ट की संभावना न के बराबर रहती है। कई बार मोशन की वजह से लार ग्रंथियां सूख जाती है। लेकिन इस मशीन से ऐसा नहीं होगा। न ही मरीजों के स्किन काले पड़ेंगे जबकि कई बार रेडियोथेरेपी के दौरान मरीजों के स्किन काले पड़ जाते हैं।
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120 दिन का समय लगा इंस्टाल करने में
रसेंदु फोगला ने बताया कि इस मशीन को इंस्टाल करने में 120 दिन का समय लगा है। साथ ही इसके लिए मुंबई एईआरबी से इजाजत भी लेनी पड़ी है। बताया कि एईआरबी यह तय करती है कि इसके रेडियशन से कही कोई दुष्प्रभाव तो नहीं है। इसके बाद ही इसे चलाने की इजाजत मिलती है।
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