नगर निगम के सूत्रों के मुताबिक, फर्म की तरफ से यूनिपोल लगाए गए और इसका रेंट खुद लिया गया, लेकिन नगर निगम में जमा नहीं किया गया। ये सिलसिला वर्ष 2015 से ही लगातार चलता रहा, लेकिन किसी की नजर फर्म के लगाए यूनिपोल और उसके जमा किए जाने वाले रेंट पर नहीं गई।
इसी बीच सिविल कोर्ट के अधिवक्ता नितिन शाही ने नगर निगम से आरटीआई के जरिये जवाब मांगा। पूछा कि जीपीएस से संबंधित जितने यूनिपोल दिए हैं, उस फर्म का कितना बकाया है। नगर निगम ने जवाब देकर इस धनरशि की जानकारी दी। तभी से ये धनराशि लंबित चली आ रही है। इसी बीच 11 गैंट्री गेट का एक नया मामला सामने आ गया। नगर आयुक्त ने कार्रवाई भी कर दी। संवाद
वर्ष 2007 में बोर्ड की बैठक में भी उठा था मामला
वर्ष 2007 में बहुजन समाज पार्टी प्रदेश की सत्ता में थी। इस दौरान शहर में लगाए गए 11 गैंट्री गेट, यूनिपोल और बस शेल्टर का जिम्मा दो फर्मों को मिला था। तत्कालीन उपसभापति राम दयाल ने बताया कि इस मामले में तत्कालीन पार्षदों ने भी शिकायत की और मुद्दा बोर्ड में उठाया था। बताया कि फर्मों की तरफ से गैंट्री गेट के अलावा खुद की होर्डिंग लगा दी गई है। बोर्ड में कार्रवाई की बात उठी, लेकिन अधिकारियों ने कार्रवाई नहीं की।
फाइल नहीं दिखा पाए लिपिक
यूनिपोल और शेल्टर के काम से जुड़े सूत्रों ने बताया कि 2007 से लेकर 2017-18 तक इस खंड में दूसरे अधिकारी तैनात थे। इसका जिम्मा भी दूसरे अधिकारियों के पास था। वर्तमान में तैनात कर्मचारियों की लापरवाही यह थी कि उन्होंने तत्कालीन फाइलों को स्थानांतरण के समय रिसीव नहीं किया था। अब जब जांच चली और पूछताछ हुई तो वे फाइल ही नहीं दिखा सके। सूत्र बताते हैं कि इस फाइल से जुड़े जिम्मेदार अपनी मौजूदगी में इन फाइलों को चलवाते रहे, लेकिन रिकार्ड की जांच नहीं की।