केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की ओर से जारी स्वच्छ वायु सर्वेक्षण-2024 में गोरक्षनगरी को देश भर में चौथा स्थान प्राप्त हुआ है। तीन से 10 लाख तक की आबादी वाले शहरों में गोरखपुर ने यह उपलब्धि हासिल की है। इस वर्ग में पहले पायदन पर फिरोजाबाद, दूसरे पर अमरावती और तीसरे पर झांसी है।
नेशनल क्लीन एयर प्रोग्राम के बेहतर परिणाम अब आने लगे हैं। शहर की वायु गुणवत्ता में तेजी से सुधार होता दिख रहा है। स्वच्छ वायु सर्वेक्षण के आंकड़े इसकी पुष्टि कर रहे हैं। फिरोजाबाद नगर निगम को 197 अंक, अमरावती को 195 और झांसी को 193.5 अंक मिले हैं। जबकि गोरखपुर नगर निगम को सर्वेक्षण में 191.5 अंक प्राप्त हुए हैं।
दो अंक से नगर निगम तीसरे स्थान से पिछड़ गया। नगर आयुक्त गौरव सिंह सोगरवाल ने बताया कि शहर को स्वच्छ और सुंदर बनाने के लिए नगर निगम लगातार कार्य कर रहा है। सड़कों की एंड टू एंड पेविंग की जा रही है। डिवाइडर पर ग्रीन बेल्ट का निर्माण, कचरा निस्तारण के लिए की गई पहल आदि इन्हीं सब की देन है कि सर्वेक्षण में गोरखपुर को चौथा स्थान प्राप्त हुआ है। 2025 में इसमें और भी बेहतर परिणाम देखने को मिलेंगे।
पहले सिक्सलेन निर्माण के दौरान उड़ती थी धूल
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दो साल पहले था धूल का गुबार...सफाई-निर्माण पूरा होने से सुधरे हालात
शहर की हवा सुधरने लगी है। स्वच्छ वायु सर्वेक्षण में गोरखपुर की बदली रैंकिंग भी इसका प्रमाण है। हालांकि, यह बदलाव आने में करीब दो साल का समय लगा है। पहले सड़कों पर धूल का गुबार था। चारों तरफ निर्माण कार्यों की वजह से भी प्रदूषण का स्तर बढ़ा रहता था।
निर्माण कार्य पूरा होने और सफाई को लेकर हुए प्रयासों की बदौलत अब जाकर गोरक्षनगरी की हवा देश में चौथी सबसे साफ हो गई है। आगे इसमें और सुधार की गुंजाइश है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि हवा में सुधार से फेफड़े के मरीजों को सबसे अधिक राहत मिलेगी।
फोरलेन निर्माण में पहले उड़ती थी धूल
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मंडल के सबसे बड़े शहर में ट्रैफिक व्यवस्था बदहाल थी। सड़कों की हालत भी खराब थी। कचरा निस्तारण का उचित प्रबंधन नहीं था। लोग जहां मन करे, वहीं कूड़ा जलाते थे। इसका असर शहर की हवा पर पड़ रहा था। शहर में एक्यूआई का स्तर बार-बार 200 को पार कर जा रहा था। पिछले साल दीपावली के आसपास तो यहां का एक्यूआई 500 तक पहुंच गया था, जो देशभर में सर्वाधिक स्तर पर था।
वायु प्रदूषण के बढ़ते असर के चलते फेफड़े के मरीज बढ़ रहे थे। मई-जून में धूल भरी सड़क पर चलने वाले अनायास ही गले के संक्रमण की चपेट में आ रहे थे। बीते साल नवंबर में करीब एक पखवाड़े तक लोगों काे गले में खराश और आंखों में जलन का अनुभव होता रहा।
वाटर स्प्रिंकलर मशीन से पानी का छिड़काव किया गया
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अमर उजाला के अभियान के बाद दिखा असर
शहर में बढ़ते प्रदूषण और इसके चलते लोगों के बीमार पड़ने की खबरें अमर उजाला के अंक में लगातार प्रकाशित होती रहीं। इसके बाद सबसे पहले पुलिस प्रशासन ने सड़कों पर जाम को हटवाने के लिए प्रयास शुरू किए।
इसके बाद जिला प्रशासन ने भी निर्माण कार्य में तेजी लाने के निर्देश दिए। मामला मुख्यमंत्री तक पहुंचा तो उन्होंने निर्माण कार्य के दौरान कार्यस्थल पर हरे रंग का पर्दा लगाने और धूल वाली सड़कों पर पानी छिड़काव कराने का आदेश दिया था।
नगर निगम ने पटरियों की कराई इंटरलाकिंग
नगर निगम ने शहर की सभी सड़कों की एंड टू एंड पेविंग (इंटरलॉकिंग) कराई। इससे सड़क किनारे की मिट्टी से धूल उड़ने में कमी आई। डिवाइडर पर पौधे लगाए जा रहे हैं, जिससे ग्रीन बेल्ट का दायरा बढ़ सके। पौधों पर धूल जमा न हो, इसके लिए स्प्रिंकलर से पानी का छिड़काव हो रहा है।
पहले सिक्सलेन निर्माण के दौरान गिरते थे लोग
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इसके अलावा देवरिया-बाईपास से नौसड़ सिक्सलेन निर्माण कार्य को तेजी से पूरा कराया जा रहा है। अधिकांश जगह सड़क पर लेपन कार्य पूरा हो चुका है। इससे भी धूल उड़ने की मात्रा में कमी आई।
कचरा निस्तारण में हुआ सुधार
नगर निगम ने पिछले कुछ वर्षों में कचरा निस्तारण के लिए कई बड़े प्रयास किए हैं। ये काफी हद तक सफल होते नजर आ रहे हैं। एकला बंधे से कूड़े का पहाड़ खत्म हो गया है, वहां पर अब बड़ी संख्या में पौधे लगाए जा रहे हैं। शहर से कूड़ा पड़ाव केंद्र ध्वस्त कर वहां एमआरएफ सेंटर बनाया जा रहा है।
बसंतपुर में गारबेज ट्रांसफर स्टेशन शुरू हो गया है तो वहीं, चरगांवा में लगभग बनकर तैयार है। सुथनी में इंटरग्रेटेड गारबेज सिटी में हर तरह के कचरे के निस्तारण के लिए प्लांट बनाए जा रहे हैं। इनमें से कई प्लांट 2025 में शुरू हो जाएंगे। निगम ने कचरा उठाने के लिए गाड़ियां भी बढ़ाई हैं, जिससे ज्यादा से ज्यादा कलेक्शन हो सके।
ई-वाहनों की कमी से कटे अंक
स्वच्छ वायु सर्वेक्षण 2024 में तीन से 10 लाख तक की आबादी वाले देश के 43 शहरों में गोरक्षनगरी ने पिछले साल के मुकाबले 11वें स्थान से सात स्थान की छलांग लगाई है। यह स्थान और ऊपर जा सकता था, लेकिन शहर में इलेक्ट्रिक वाहनों की कमी और कुछ जगहों पर अभी चल रहे निर्माण कार्यों की वजह से कुछ अंक कट गए। पहला, दूसरा और तीसरा पुरस्कार के रूप में क्रमश: 75 लाख, 50 लाख और 25 लाख रुपये मिलते हैं।
पैडलेगंज से रूस्तमपुर सिक्सलेन
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इन मानकों पर होती है रैंकिंग
शहर में सड़कें बनी हों और इंड टू इंड पेविंग कार्य हो।
मैकेनाइज्ड स्वीपिंग को बढ़ावा दिया जा रहा हो।
कचरे का निस्तारण सुदृढ़ हो, सीएंडडी और सॉलिड वेस्ट मैनेजमेंट की व्यवस्था हो।
ग्रीन बेल्ट का विकास, डंप साइट के लिए नगर वाटिका, इंटेलिजेंट ट्रैफिक मैनेजमेंट सिस्टम, मियावाकी विधि से वनीकरण होना जरूरी है।
स्वच्छ वायु के लिए मिले 116.32 करोड़
पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने जनवरी 2019 में राष्ट्रीय स्वच्छ वायु कार्यक्रम (एनसीएपी) की शुरुआत की थी। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) ने गोरखपुर को भी ‘नॉन अटेनमेंट सिटी'' की सूची में शामिल किया। यह कार्रवाई पांच साल के आंकड़ों के आधार पर हुई।
नगर आयुक्त गौरव सिंह सोगरवाल
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11 नवंबर 2020 को नाॅन अटेनमेंट सिटी में शामिल होने के बाद शहर की हवा की गुणवत्ता सुधार के लिए वित्त वर्ष 2021-22 में 9.69 करोड़ रुपये नगर निगम को मिले। हांलाकि यह धनराशि वित्त वर्ष 2022-23 की धनराशि 27.87 करोड़ के साथ कुल 37.51 करोड़ मिली। दोबारा साल 2023-24 में 29.36 करोड़ मिले। कुल मिलाकर 66.87 करोड़ रुपये मिले। मिली धनराशि का 86 फीसदी यानी तकरीबन 57.19 करोड़ रुपये नगर निगम उपयोग कर चुका है। अब साल 2024-25 के लिए पुन: 49.51 करोड़ रुपये मिले हैं।
नगर आयुक्त गौरव सिंह सोगरवाल ने बताया कि शहर की हवा में सुधार के लिए राष्ट्रीय स्वच्छ वायु कार्यक्रम के तहत विभिन्न प्रयास किए जा रहे हैं। स्वच्छ वायु सर्वेक्षण 2025 में इससे काफी बेहतर परिणाम मिलेगा। शहर में कई निर्माण कार्य प्रगति पर हैं, ई-व्हीकल भी मानक के मुताबिक कम हैं।