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सलाह: कोरोना संक्रमण में लाभकारी है गिलोय, आयुर्वेदिक चिकित्सक ने दी खास जानकारी

Sat, 08 May 2021 01:19 PM IST
vivek shukla अमर उजाला नेटवर्क, गोरखपुर।

सार

गिलोय के रूप में प्रकृति ने हमें ऐसा वरदान दिया है, जिससे न सिर्फ कोविड वायरस के प्रकोप से बचा जा सकता है, बल्कि शरीर में होने वाले विभिन्न रोगों में भी यह औषधि आश्चर्यजनक फायदा देती है।
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गिलोय। - फोटो : अमर उजाला।
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विस्तार
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आयुर्वेदिक चिकित्सक डॉ. अशोक कुमार गौतम ने कहा, कोरोना संक्रमण में गिलोय का सेवन लाभकारी है। गिलोय के रूप में प्रकृति ने हमें ऐसा वरदान दिया है, जिससे न सिर्फ कोविड वायरस के प्रकोप से बचा जा सकता है, बल्कि शरीर में होने वाले विभिन्न रोगों में भी यह औषधि आश्चर्यजनक फायदा देती है। राजकीय आयुर्वेद चिकित्सालय जैनपुर के प्रमुख चिकित्सा अधीक्षक डॉ. अशोक ने बताया कि संक्रमण में गिलोय का उपयोग लाभप्रद है।
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उन्होंने बताया कि गिलोय की बेल विभिन्न पेड़ों मसलन, नीम, आम आदि पर पसरी हुई मिलती है। इस पर पीले-हरे रंग के फूल झुंड में लगते हैं। पत्ते कोमल पान के आकार के तथा फल मटर के दाने जैसे होते हैं। यह लता कभी सूखती नहीं है और न ही कभी नष्ट होती है।

जिस वृक्ष पर चढ़ती है उस वृक्ष के कुछ गुण भी अपने अंदर समाहित कर लेती है। इसीलिए नीम वृक्ष पर चढ़ी गिलोय को श्रेष्ठ माना जाता है। इसमें गिलोइन नाम का एक कड़वा ग्लूकोसाइड तथा तीन प्रकार के एल्कोलाइट होते हैं। इसमें एक प्रमुख यौगिक बर्बेरीन पाया जाता है। यह त्रिदोष शामक, हृदय को बल देने वाला, रक्त विकार तथा पांडु रोग में गुणकारी है। कास, दौर्बल्य, प्रमेह, मधुमेह त्वचा के रोगों में तथा कई प्रकार के ज्वर में उत्तम कार्य करता है।
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इस तरह करें उपयोग

गिलोय स्वरस 20 ग्राम में 1 ग्राम पिप्पली चूर्ण तथा एक चम्मच मधु मिलाकर सुबह व शाम को प्रयोग करें। इससे जीर्ण ज्वर, कास, अरुचि प्लीहा रोग आदि नष्ट होते हैं। गिलोय के स्वरस में पाषाणभेद का चूर्ण 2 ग्राम मिलाकर एक चम्मच शहद के साथ दिन में तीन चार बार चाटने से मूत्रकृच्छ रोग मिटता है। गिलोय के रस का गुड़ के साथ सेवन करने से कब्ज मिटता है।

मिश्री के साथ सेवन करने से पित्त के उपद्रव शांत होते हैं। मधु के साथ सेवन करने से कफ से निजात मिलती है, सोंठ के साथ सेवन करने से आमवात नष्ट होता है। काली मिर्च और उष्ण जल के साथ सेवन करने से भी लाभ मिलता है। कोविड-19 के कम लक्षण वाले रोगियों में भी आयुष मंत्रालय द्वारा संशमनी वटी के नाम से इसे प्रयोग करने की अनुमति दी गई है।

आयुर्वेद शास्त्रों में है बैक्टीरिया, वायरस का वर्णन
आयुर्वेद ग्रंथों में हजारों वर्ष पूर्व ही वायरस और बैक्टीरिया जनित रोगों का वृहद वर्णन और उनसे बचाव के उपायों का भी उल्लेख किया गया है। वायरस प्रोटीन और डीएनए या आरएनए से बनी ऐसी संरचना है जिसे क्रिस्टल के रूप में इकट्ठा किया जा सकता है।

जीवित कोशिका के संपर्क में आते ही यह अपनी वृद्धि करने लगता है। आचार्य चरक के अनुसार विषाणु के शरीर के संपर्क में आते ही इसमें भी जान आ जाती है। जब हमारे शरीर के वात, पित्त और कफ दोष साम्यावस्था में होते हैं तो इन बीमारी फैलाने वाले सूक्ष्म जीव कोई नुकसान नहीं पहुंचा पाते हैं। कोविड-19 में सबसे पहले ज्वर, खांसी, सांस फूलना आदि लक्षण दिखते हैं। आयुर्वेद के अनुसार सर्वप्रथम अन्नवह स्रोत ही दूषित होता है। इस कारण भूख न लगना, पेट फूला रहना, उल्टी, दस्त, ज्वर होना आदि लक्षण प्रकट होते हैं। इसके बाद प्राणवह स्रोत दूषित होता है, एवं तब गंध का मालूम ना पड़ना, गले में खराश, खांसी, सांस फूलना आदि लक्षण प्रकट होते हैं।

जब त्रिदोष साम्यावस्था में और अग्नि अच्छी होती है तो वह सभी विकारों को पाक कर देती है, जिस कारण रोग उत्पन्न नहीं हो पाता। आचार्य चरक ने नित्य सेवनीय पदार्थों का वर्णन किया है, जिसमें आंवला शहद, जीवंती, उबला हुआ पानी आदि हैं। इनके सेवन से शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता अच्छी रहती है।
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