जीडीए के सचिव रामसिंह गौतम ने बताया कि ये मानचित्र गलत हैं, इन्हें निरस्त किया जा रहा है। जीडीए की ओर से गूगल मैप के आधार पर जुटाई गई जानकारी के अनुसार इस जमीन पर 2002 में मिट्टी गिराई गई और 2003 में निर्माण शुरू हो गया।
वहीं यशवंत और आशीष सक्सेना का कहना है कि सारे जरूरी दस्तावेज और फीस जमा करने के बाद प्राधिकरण ने उनके घरों के मानचित्र स्वीकृत किए। अब प्रशासन की मिलीभगत से जीडीए जबरन उनका मानचित्र निरस्त करने की साजिश कर रहा है जिसके खिलाफ वह कोर्ट में साक्ष्यों के साथ अपना पक्ष रखेंगे।
जीडीए उपाध्यक्ष अनुज सिंह ने बताया कि ताल सुमेर सागर में मानचित्र पास होने की जांच की जा रही है। सुमेर सागर के साथ जटेपुर का विवरण भी तहसील से मंगाया गया है। फाइल की खोज जारी है। जिसकी भी जमीन में कमी होगी, उसका मानचित्र निरस्त होगा। विभाग के किसी तत्कालीन कर्मचारी की संलिप्तता मिली तो उसके खिलाफ भी कार्रवाई की जाएगी।