कुत्ता, बिल्ली, छछूंदर और चूहों से सावधान रहने की जरूरत है। इन्हीं जीवों की वजह से गोरखपुर में इंसेफेलाइटिस मरीजों की संख्या बढ़ती जा रही है। इस साल अब तक मिले 125 इंसेफेलाइटिस मरीजों में 60 प्रतिशत मरीजों में स्क्रब टाइफस के लक्षण मिले हैं। इसके अलावा जिन नौ मरीजों की मौत हुई है, उनमें पांच में स्क्रब टाइफस के लक्षण मिले थे। यही वजह है कि विभाग ने अपील की है कि इन जानवरों से बच्चों को दूर रखें।
जानकारी के मुताबिक, पिछले साल की तुलना में इस साल इंसेफेलाइटिस मरीजों की संख्या बढ़ी है। बीआरडी मेडिकल कॉलेज के बाल रोग विशेषज्ञ डॉ. भूपेंद्र शर्मा ने बताया कि इंसेफेलाइटिस के कारकों में स्क्रब टाइफस का बड़ा रोल है। इंसेफेलाइटिस के 60 प्रतिशत मरीज स्क्रब टाइफस के हैं। यह बेहद खतरनाक है। यह गाय, भैंस, बकरी कुत्ते, बिल्ली, चूहा और छछूंदर के जरिये भी फैल रहे हैं। सीएमओ डॉ सुधाकर पांडेय ने अपील की है कि इन जानवरों से लोग दूरी बनाएं। बच्चों को इस मौसम में इनसे दूर रखें।
बाढ़ प्रभावित इलाकों में पालतू जानवरों से ज्यादा खतरा
सीएमओ ने बताया कि बाढ़ प्रभावित इलाकों में पालतू जानवरों से खतरा ज्यादा है, क्योंकि इन इलाकों में जानवर पानी में जा रहे हैं, जो की वायरस और बैक्टीरिया ला रहे हैं। ऐसे में बच्चों को पालतू जानवरों से दूर रखें। अगर पालतू जानवर घर में हैं, तो उन्हें साफ रखें।
इन जानवरों से इंसेफेलाइटिस का 90 प्रतिशत तक खतरा
पालतू जानवरों से इंसेफेलाइटिस का खतरा 80 से 90 प्रतिशत तक है। इनके शरीर पर चार तरह के एक्यूट इंसेफेलाइटिस सिंड्रोम (एईएस) के बैक्टीरिया मिले हैं। यह बैक्टीरिया इतने खतरनाक हैं कि शरीर के किसी भी अंग को नुकसान पहुंचाने के साथ-साथ मानसिक रूप से बीमार बना सकते हैं।
आरएमआरसी के मीडिया प्रभारी व सीनियर साइंटिस्ट डॉ अशोक पांडेय ने बताया कि गाय, भैंस, कुत्ते और बकरी पर शोध किए गए हैं। इनमें चार तरह के बैक्टीरिया मिले हैं। यह बैक्टीरिया जूं (किलनी) में पाए गए हैं। इनमें बोफिलस माइक्रोप्लस, हायलोमा कुमारी रिफिसेफेलस, सैंग्वीनियस और डर्मासेंटर आरोटस नामक बैक्टीरिया मिले हैं। यह चारों बैक्टीरिया बेहद खतरनाक होते हैं।