असिस्टेंट प्रोफेसर दीपेंद्र मोहन सिंह।
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गोरखपुर विश्वविद्यालय के समाजशास्त्र विभाग के असिस्टेंट प्रोफेसर दीपेंद्र मोहन सिंह इनदिनों वनटांगिया मजदूरों की सामाजिक, आर्थिक व सांस्कृतिक संरचना पर शोध कर रहे हैं। दो वर्षों के शोध में अब तक बहुत सारा बदलाव उनके सामने आया है। मसलन, सौ साल पुरानी वनटांगियां मजदूरों की जीवन पद्धति अब बिलकुल बदल चुकी है।
विवि की हीरापुरी कॉलोनी में रहने वाले दीपेंद्र मोहन सिंह मूलत: नगरा, बलिया के भीमपुरा नंबर एक के निवासी हैं। शोध के मुताबिक वनटांगिया मजदूरों का रहन-सहन और जीवन यापन का तौर-तरीका तो बदला ही है उनकी सांस्कृतिक संरचना में भी तेजी से बदलाव देखने को मिला है। वैवाहिक समारोह में अब वन आधारित पूजा पद्धति की जगह आमजनों की पारंपरिक पद्धति शामिल हो रही है। उनके पारंपरिक लोकगीतों की जगह आधुनिक गीत शामिल हो रहे हैं। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के चलते ही इनके जीवन पद्धति में बदलाव आया है। उनके ही प्रयास से प्रदेश सरकार द्वारा लिए गए निर्णय में इन गांवों को राजस्व ग्राम घोषित कर मुख्य धारा में लाया गया है।
टोंग्या पद्धति पर म्यांमार में बसाने गए थे जंगल
शोध के मुताबिक वर्तमान में वनटांगिया ग्राम में बसे लोग वस्तुत: वनटांगिया मजदूरों की वही पीढ़ियां हैं, जिनका अतीत 20वीं शताब्दी के वनों से जुड़ा है। यह तथ्य है कि गोरखपुर जिले में टांगिया पद्धति 1922 से 1930 के बीच लाई गई थी। म्यांमार की भाषा में ‘टोंग’ का अर्थ टीला और ‘या’ का अर्थ खेती होता है। साम्राज्यवादियों ने इस पद्धति का विकास इसलिए किया, ताकि वनों को व्यावसायिक मूल्य वाले वृक्षों से पाटा जा सके।
अंग्रेजी शासनकाल में पूर्वी उत्तर प्रदेश में रेल लाइन बिछाने, सरकारी विभागों की इमारतों के लिए लकड़ी उपलब्ध कराने के लिए बड़े पैमाने पर जंगल काटे गए। फिर वनीकरण के लिए 1920 में बर्मा (म्यांमार) में आदिवासियों द्वारा पहाड़ों पर जंगल तैयार करने के साथ-साथ खाली स्थानों पर खेती करने की पद्धति ‘टोंग्या’ को आजमाया गया, इसलिए इस काम को करने वाले श्रमिक वनटांगिया कहलाए। ये श्रमिक भूमिहीन थे, इसलिए जंगल के ही होकर रह गए।