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Gorakhpur News: आमी नदी में नहीं जाएगा फैक्ट्रियों का दूषित पानी...गीडा में बनेगा सीईटीपी

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गोरखपुर। आमी नदी में दूषित पानी जाने से रोकने के लिए गोरखपुर औद्योगिक विकास प्राधिकरण (गीडा) ने बड़ी पहल की है। गीडा में कॉमन एफ्लुएंट ट्रीटमेंट प्लांट (सीईटीपी) की स्थापना को लेकर लंबे समय से चली आ रही मांग अब पूरी होने के करीब है। गीडा प्रशासन ने परियोजना की विस्तृत परियोजना रिपोर्ट (डीपीआर) तैयार कर शासन को भेज दी है, जिसके बाद इसका भविष्य अब उच्च स्तरीय समीक्षा बैठक पर निर्भर करेगा।
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सीईटीपी को गीडा के सेक्टर-13 में स्थापित किए जाने का प्रस्ताव है। इस प्लांट का मुख्य उद्देश्य औद्योगिक इकाइयों से निकलने वाले दूषित पानी को शोधित कर पर्यावरणीय नुकसान को रोकना है। गीडा क्षेत्र में कई उद्योग संचालित हैं लेकिन एक समग्र ट्रीटमेंट सिस्टम की कमी के कारण पर्यावरणविदों और स्थानीय उद्यमियों की ओर से लगातार चिंता व्यक्त की जा रही थी। कई फैक्ट्रियों का दूषित पानी आमी नदी में जाने की शिकायत आ रही थी। सीईटीपी में नाले के जरिये इकाइयों का दूषित पानी पहुंचेगा। वहां से उसे ट्रीट कर नदी में छोड़ा जाएगा। यह सीईटीपी चार एमएलडी (मिलियन लीटर प्रतिदिन) क्षमता का होगा। इस परियोजना की अनुमानित लागत लगभग 57 करोड़ रुपये है। इसके लिए केंद्र सरकार ने 57 करोड़ रुपये की मंजूरी दी थी, जिसमें लागत का एक हिस्सा केंद्र सरकार, राज्य सरकार और शेष गीडा व औद्योगिक इकाइयों द्वारा वहन किया जाना है।
गीडा के अपर मुख्य कार्यपालक अधिकारी (एसीईओ) रामप्रकाश ने बताया कि तैयार की गई डीपीआर में प्लांट की क्षमता, लागत, खर्चे का मॉडल, तकनीकी विशेषताएं और संचालन से जुड़ी जिम्मेदारियों का विस्तृत उल्लेख किया गया है। उन्होंने कहा कि डीपीआर को शासन को भेज दिया गया है और अब मंजूरी का इंतजार है।
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शासन की ओर से जल्द ही लखनऊ में प्रमुख सचिव (औद्योगिक विकास) की अध्यक्षता में एक उच्च स्तरीय बैठक बुलाई जाएगी, जिसमें वित्त और पर्यावरण विभाग के अधिकारी भी शामिल होंगे। इस बैठक में डीपीआर के सभी बिंदुओं की समीक्षा की जाएगी। स्वीकृति मिलने के बाद परियोजना को तेजी से क्रियान्वित किए जाने की संभावना है।
सीईटीपी परियोजना को औद्योगिक विकास का अहम आधार माना जा रहा है। अधिकारियों का कहना है कि इसके शुरू होने से न केवल प्रदूषण नियंत्रण में मदद मिलेगी, बल्कि गीडा में नए उद्योगों की स्थापना की राह भी आसान होगी, क्योंकि मौजूदा पर्यावरण मानकों के चलते बिना ट्रीटमेंट प्लांट के नई इकाइयों को अनुमति मिलने में अड़चनें पैदा हो रही थीं।
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