डॉ अमित शाही बताते हैं कि बचने के उपाय आसान है। बच्चों का मन जिस काम में लग रहा है, उसेे करने दें। रचनात्मक कार्यों में बच्चों को लगाएं। पेंटिंग प्रतियोगिता जैसे आयोजन खुद उनके साथ करें। उनके साथ सुबह-शाम खेलें। इससे वह एक्यूट तनाव का शिकार नहीं होंगे।
डब्ल्यूएचओ ने मानसिक बीमारी की सूची में किया है शामिल
डॉ अमित शाही ने बताया कि ऑनलाइन गेम की लत नशीले पदार्थ के सेवन से कम खतरनाक नहीं है। इसलिए विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) ने इसे मानसिक बीमारियों की सूची में शामिल किया है। इसके कई नाम हैं जैसे इंटरनेट की लत, मोबाइल की लत या गेमिंग एडिक्शन। नशीले पदार्थ का सेवन करने पर वह शरीर के अंदर जाकर नुकसान पहुंचाता है, जबकि ऑनलाइन गेम की लत में दूसरी तरह का असर होता है। यह मानसिक रूप से बच्चों को दूसरी ओर ले जाता है।
यह दिक्कतें हों तो डॉक्टर को दिखाएं
डॉ अमित शाही ने बताया कि कई बच्चों को मोबाइल के बिना घबराहट और बेचैनी होने लगती है। कई अभिभावकों को पता ही नहीं चलता कि यह ऑनलाइन गेम की लत का परिणाम है। इस समस्या पर माता-पिता का ध्यान बच्चों पर नहीं जाता है। इसकी जानकारी उन्हें तब हो पाती है जब समस्या बढ़ जाती है। इसलिए इस तरह की दिक्कतें अगर होती हैं तो तत्काल चिकित्सक से संपर्क करें।
राप्ती नगर का रहने वाला एक आठ वर्षीय बालक इंटरनेट पर हार्ड कोर गेम खेलते-खेलते इस तरह अवसाद में आ गया कि उसे हर जगह ऐसा दिखता था कि मानो उसे लोग मारने आ रहे हैं। शाम होते ही वह कांपने लगता था। हालात ऐसे हो गए कि उसे जिला अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा। वह डॉक्टरों को देखकर रोने लगता था।
केस- दो
हरिओम नगर के रहने वाले 10 वर्षीय बालक को मोबाइल पर गेम खेलने की लत लग गई। परिजन गेम को अनस्टॉल कर दिए तो उसने खाना ही छोड़ दिया। उसके सिर में दर्द भी रहने लगा। परिजन बच्चों के डॉक्टर के पास ले गए तो उसे मानसिक रोग विभाग भेज दिया गया। चिकित्सकों के अनुसार उसे गेमिंग एक्डिशन हो गया था। काउसिंलिंग करके उसे ठीक किया गया।