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गोरखपुर: बीआरडी के डॉक्टरों ने बचा ली बच्चे के आंख की रोशनी, 27 साल में पहली बार मिला ऐसा केस

Sat, 02 Oct 2021 08:12 PM IST
vivek shukla अमर उजाला नेटवर्क, गोरखपुर।

सार

आठ साल की उम्र में पूरी आंखों में सिस्ट ने ढक लिया था। परिजन कई जगह इलाज करा चुके थे लेकिन कहीं बात नहीं बनी।
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बीआरडी मेडिकल कॉलेज। - फोटो : अमर उजाला
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गोरखपुर बीआरडी मेडिकल कॉलेज के डॉक्टरों ने तीन साल के मासूम कीआंखों की रोशनी बचा ली। डेढ़ घंटे तक ऑपरेशन कर मासूम के बायीं आंख के सिस्ट को अलग कर दिया है। इसके बाद से मासूम अब बायीं आंख से भी देखने लगा है। डॉक्टरों के मुताबिक यह बेहद जटिल ऑपरेशन है। इसे साइंस की भाषा में कंजंक्टिवा कहते हैं। यह बीमारी लाखों में किसी एक बच्चे को जन्मजात होती है।

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जानकारी के मुताबिक, बिहार के सिवान निवासी पुष्पा देवी के तीन साल के पुत्र लवकुश तीन माह का था, तभी उसकी बायीं आंख के अंदर सिस्ट (मांस का टुकड़ा) दिखाई देने लगा। परिजन बिहार के कई निजी अस्पतालों से लेकर सरकारी अस्पतालों में इलाज कराएं, लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ। इस बीच वह और तेजी से बढ़ता गया।

स्थिति ऐसी हो गई है कि तीन साल की उम्र में लवकुश की बायीं आंख पूरी तरह से ढक गई और उसे दिखाई देना बंद हो गया। इस बीच परिजनों को किसी ने बीआरडी मेडिकल कॉलेज में इलाज कराने की सलाह दी। परिजन एक सप्ताह पहले उसे लेकर बीआरडी मेडिकल कॉलेज आए। जहां पर उसकी जांच की गई तो पता चला कि उसे कंजंक्टिवा बीमारी है। इसका एक मात्र इलाज है ऑपरेशन।

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27 साल में पहली बार इतना बड़ा सिस्ट देखा

मेडिकल कॉलेज के नेत्र रोग विभागध्यक्ष डॉ. राम कुमार जायसवाल ने बताया कि परिजनों की सहमति के बाद डेढ़ घंटे तक ऑपरेशन कर सिस्ट को अलग किया। ऑपरेशन करने वाली टीम में डॉ. अंजार अहमद, डॉ. राजश्री पांडेय, डॉ. दीप्ति और एनेस्थीसिया के डॉ. मेहताब आलम का विशेष सहयोग रहा।  

डॉ. राम कुमार जायसवाल ने बताया कि 27 साल हो गए इस पेशे में। लेकिन इतना बड़ा सिस्ट वह भी मासूम के आंखों में नहीं देखा। यह बीमारी लाखों मासूमों में किसी एक को होती है। खास बात यह है कि यह जन्मजात होती है। लेकिन मासूम के परिजनों के मुताबिक उसे तीन माह बाद शुरू हुआ। यह भी चिंता वाली बात है।

क्या हैं कंजंक्टिवा
डॉ. राम कुमार ने बताया कि कंजंक्टिवा को सिस्ट भी कहा जाता है। सिस्ट एक मांस का टुकड़ा होता है, जो आंखों के ट्रांसपेरेंट मुकौस मेम्ब्रेन (पारदर्शी श्लेष्म झिल्ली) के सफेद हिस्से को धीरे-धीरे ढक लेता है। इसकी वजह से आंखों से दिखाई देना बंद हो जाता है। एक समय ऐसा आता है कि रोशनी चली जाती है। नवजात शिशुओं में टियर डक्ट के (अश्रु नलिका) बंद होने के कारण यह समस्या आती है।
 
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