नारायण के नवें अवतार के रूप में भगवान बुद्ध हिंदू समाज द्वारा भी पूजित हैं। भूमिस्पर्श मुद्रा की इस प्रतिमा के साथ ही आनुसंगिक रूप से अष्टभुजी दुर्गा, पद्मपाणि विष्णु, कुबेर, गंगा तथा यमुना जैसी दैवीय प्रतिमाएं भी उत्कीर्ण हैं जो हिंदू तथा बौद्ध धर्म के एक मूल तथा एकनिष्ठता को भी अभिव्यक्त करती हैं। प्रतिमा तथा पूजा यह भी दर्शाती हैं कि हिंदू व बौद्ध धर्म के लोगों में शुरू से ही कोई मतभेद नहीं रहा है और दोनों एक दूसरे के धर्म का आदर करते हुए पूजा पाठ करते रहे हैं।
बोधि प्राप्ति के लिए बुद्ध ने लिया था कठोर व्रत
कुशीनगर के गाइड डॉ. अभय राय के अनुसार राजकुमार सिद्धार्थ को ज्ञान की खोज में घर छोड़े लगभग छह वर्ष बीतने को थे। सिद्धार्थ यहां वहां ज्ञान की खोज में घूमते फिरते तथा विभिन्न आचार्यों के मत मतांतरों का परीक्षण करते हुए उरूवेला पहुंचे। हालांकि पुराणों में इस स्थल को धर्मारण्य के नाम से संबोधित किया गया है, किंतु बौद्ध साहित्य इसे उरूवेला के नाम से संबोधित करते दिखते हैं।
इस स्थल उरूवेला (धर्मारण्य) की अवस्थिति दो महान नदियों- फल्गू तथा निरंजना के बीच के दोआब में है और उरूवेला के निकट ही इन दोनों नदियों का संगम स्थल स्थित होने के कारण उरूवेला में ये दोनों नदिया समानांतर रूप में एक दूसरे के निकट बहती हैं।
एक दिन राजकुमार सिद्धार्थ ने भी पद्मासन लगाकर भू-माता को स्पर्श करके संकल्प ले लिया - 'ऐ धरती माता , आज के बाद जब तक मैं बोधि प्राप्त न कर लूं तब तक भोजन का एक दाना तक ग्रहण नहीं करूंगा। यही संकल्प अंतत: उनके बुद्ध बनने का पूर्व चरण अर्थात प्राक्बोधि तपस्या बना जिसके कारण यह 'भूमिस्पर्श मुद्रा' बौद्ध जगत में अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जाती है।