भारतीय मनोरंजन टेलीविजन भी अब अंतर्राष्ट्रीय चलन अपना रहा है। एक सीरीज खत्म होने के साथ ही उस कहानी को दूसरी सीरीज में पिरो देने का सोनी टीवी का प्रयोग चंद्रगुप्त मौर्य उत्सुकता जगाता है। यही इसकी यूएसपी भी है और यही सबसे बड़ी चुनौती भी।सिद्धार्थ कुमार तिवारी के बनाए सीरियल पोरस की अगली कड़ी के तौर पर बनाई गई टीवी सीरीज चंद्रगुप्त मौर्य के प्रसारण का एक पखवाड़ा बीतने के साथ ही इसकी लोकप्रियता की चुनौतियां बढ़ने लगी हैं।
सीरीज में कमियां तमाम हैं। ईसा पूर्व को बी.सी. की तरह लिखने के फेर ई और सा को अलग अलग कर लिखने वाले इस सीरियल की रिसर्च टीम काफी कमजोर दिखती है। धनानंद पिछड़े वर्ग का है। उसके खिलाफ ब्राह्मण चाणक्य है, जिसे एक उपेक्षित परिवार के बालक को मगध का राजा बनाना है।चाणक्य हमेशा से भारतीय संस्कृति का सबसे विस्मयकारी चरित्र रहा है। कॉरपोरेट जगत से लेकर राजनीति तक चाणक्य नीति के संदर्भ लिए जाते हैं।
पर चाणक्य नीति बनी कैसे, इसका खुलासा करने की कोशिश में चंद्रगुप्त मौर्य सीरीज तमाम किवंदितयों और पौराणिक किस्सों को जोड़ने की कोशिश करता है। सीरीज की मेकिंग का स्तर बाहुबली फिल्म की तरह है। यह दिखने में भव्य है। पर अनावश्यक शोर मचाता संगीत, ठग्स ऑफ हिंदोस्तान की तरह के कृत्रिम से दिखने वाले सेट्स और इसके कलाकारों का अतिरेक भरा अभिनय सीरीज की सबसे बड़ी कमजोरी है। सोनी टीवी लगातार कोशिश में रहा है कि किसी तरह उसका प्राइम टाइम शीर्ष चैनलों को टक्कर दे सके। इसकी दिक्कत है मुंबई की इंडिया से बाहर निकलकर असली भारत को समझने की कोशिश न करना। और, यही इस सीरीज की भी सबसे बड़ी बाधा है।