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'मटरू की बिजली..' में है सबके लिए कुछ न कुछ

Fri, 11 Jan 2013 05:26 PM IST
रोहित मिश्र
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इस फिल्म के अंदर दो फिल्में हैं। पहली फिल्म में मटरु है, बिजली है और मनडोला है। मनडोला की शराब है। शराब पीने के बाद उसकी मस्ती है। बिजली की नादानियां और शरारतें हैं। मटरु का सेंस ऑफ ह्रयूमर है। इसी फिल्म में चल रही दूसरी फिल्म में मनडोला एक महात्वाकांक्षी उद्योगपति के रूप में है। किसानों की जमीन को लेकर उसमें फैक्ट्री बनाने के उसके सपने हैं। किसानों की जमीनों को अधिग्रहित करने की सरकारी चालाकियां हैं। इन कोशिशों को हवा देतीं चौधरी देवी हैं। इन जमीनों को बचाने के लिए मटरु अपने दूसरे अवतार माओ के रूप में हैं।
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फिल्म में यह दोनों कहानियां बारी-बारी आती हैं। जमीन अधिग्रहण का मुद्दा गंभीर न लगे इसलिए उसमें बिजली और मटरू जैसे शो केस रखे गए हैं। चाहत यही कि दर्शक जमीन अधिग्रहण वाले मसले को समझें तो पर उसमें उलझें नहीं। विशाल भारद्वाज की इस फिल्म के साथ एकमात्र दिक्कत यह है कि वह हर वर्ग के दर्शक को साधने का प्रयास कर रही होती है।

फिल्म के कई दृश्य ऐसे हैं जहां पर दर्शक वाकई कुछ गंभीर देखने-सुनने के मूड में होते हैं पर विशाल फिल्म का ट्रैक बदलकर उसे हल्का कर देते हैं। इसी तरह जब हल्की-फुल्की कहानी मजे से चल रही होती है तो बीच में उनका 'इंटलैक्चुअल और जवाबदेह सिनेमा' ब्रेकर बनकर आ जाता है। अगर इसे सकारात्मक रूप से देखें तो कह सकते हैँ कि 'मटरू की बिजली का मनडोला' में सबके लिए कुछ न कुछ है।
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कहानीः
फिल्म की कहानी हरियाणा के एक गांव में बसे उद्योगपति मनडोला (पंकज कपूर) के इर्द-गिर्द घूमती है। गांव का नाम भी मनडोला के नाम पर ही है। मनडोला का सपना गांव में फैक्ट्री और मॉल बनाने का है। किसान अपनी खेती देने के लिए तैयार नहीं हैं। मनडोला शराबी है और वह ज्यादा शराब न पिए इसे रोकने के लिए वह अपने लिए नौकर मटरु (इमरान खान) को रखता है। मनडोला की लड़की बिजली (अनुष्का शर्मा) आक्सफोर्ड से पढ़कर गांव लौट आयी है और उसी तालाब में नहाती है जिसमें गांव की भैंसे नहाती हैं। मनडोला के इस सपने को पूरा करने के लिए उसी क्षेत्र की नेता चौधरी देवी(शबाना आजमी) आगे आती हैं।

वह सरकारी मशीनरी का इस्तेमाल करके मनडोला को वह जमीन दिलवाने की 'चालाक कोशिश' करती हैं। वह ऐसा इसलिए करती हैं क्योंकि वह अपने बेटे बादल (आर्य बब्बर) की शादी बिजली से करवाना चाहती हैं। यह चौधरी देवी की साजिश है। मटरू एक नौकर के अलावा एक माओ (कथित नक्सली) की भूमिका में किसानों की जमीन उनके पास रहने की लड़ाई पर्दे के पीछे से लड़ता है। वह दिल्ली जेएनयू से पासआऊट है। इंटरवल के बाद बिजली मटरू के करीब आती हैं और फिल्म लेती जाती है। यह मोड़ बादल और बिजली की शादी के टूटने और चौधरी देवी के एक्सपोज होने के साथ ही मुक्कमल होते हैं।

अभिनय
फिल्म के हीरो एक तरह से पंकज कपूर ही हैं। पूरी फिल्म उन्हीं के इर्द-गिर्द घूमती है। फिल्म में पंकज कपूर के दो चरित्र दिखाए गए हैं। पहला शराब पीने के पहले और दूसरा शराब पीने के बाद। शराब पीने के बाद मनडोला गांव वाले से अपने ही खिलाफ मोर्चा निकलवाता है। अपनी बेटी की शादी, अपने ड्राइवर मटरू से करवाता है।

जिस जल रहे चार्टर प्लेन में वह सवार है उसी की लपटों से अपना सिगार सुलगाता है। यही मनडोला शराब उतरने के बाद एक डिप्लोमैटिक कारोबारी है। पंकज कपूर ने मनडोला के इन दोनों किरदारों को बेहतरीन तरीके से जिया है। खासकर 'शराबी नौटंकियां' तो अद्भुत रहीं हैं।

इमरान खान इस फिल्म के हीरो होते हुए भी गेस्ट कलाकार जैसे लगते हैं। इमरान ने हरियाणवी तो अच्छी बोली है पर वह इस किरदार में बहुत उम्दा नहीं लगे हैं। फिल्म उनके 'हरियाणवी छोरे' और 'जीएनयू पासआऊट इंटलैक्चुअल' दोनों ही रूप दिखाना चाहती है। इन दोंनो ही रूपों को वह निभाते जरूर हैं पर जीते नहीं।

बिजली के रूप में अनुष्का शर्मा औसत हैं। जीवनसाथी चुनने में कंफ्यूज्ड लड़की की भूमिका उन्होंने अच्छी निभाई है। फिल्म के क्लाइमेक्स में वह अच्छी ऐक्टिंग करती हैँ। नेता के रूप में शबाना आजमी हमेशा की तरह सदाबहार हैं। आर्य बब्बर कमदिगाम के लड़के की भूमिका को ठीक-ठाक निभा ले गए हैं।

निर्देशन
विशाल भारद्वाज की तुलना पहले उन्हीं से की जाए। 'सात खून माफ', 'इश्किया', 'कमीने', 'ओमकारा' और 'मकबूल' जैसी फिल्में बना चुके विशाल इस फिल्म में निर्देशक के रूप में आगे नहीं बढ़ते। हां सिनेमा के प्रति बाजारी जवाबदेही की सोच जरूर उनमें पहले से बढ़ी है। विशाल इस फिल्म को भूमि अधिग्रहण की फिल्म कहलवाना पसंद नहीं करवाना चाहते।

वह चाहते हैं कि लोग इसे मटरु, बिजली और मनाडोला की कहानी के रूप में ही दिखे। इसीलिए विशाल विषय की बारीकियों में घुसने के बजाय अपने चरित्रों के स्वभाव की बारीकियों में घुसते हैं। वह जमीन अधिग्रहण से बड़ा मुद्दा मनडोला के मूड को बनाना चाहते हैं। इन सब कोशिशों के साथ-साथ उन्हें अपनी जवाबदेह फिल्मकार वाली इमेज की भी चिंता है। पूरी फिल्म में विशाल का यह उहापोह दिखता है। अपनी यह कोशिशें विशाल इंटरवल को इंटरवल न लिखकर 'अध्धा' लिखकर पूरी कर लेते है। कुल मिलाकर विशाल ने एक ऐसी फिल्म रचने की कोशिश की है जिसमें हर किसी के लिए कुछ न कुछ हो।

संगीत
विशाल भारद्वाज ने अपनी पत्नी रेखा भारद्वाज के साथ मिलकर खूबसूरत संगीत रचा है। गाने गुलजार ने लिखे हैं तो सुनने में भी अच्छे लगे हैं। विशाल भारद्वाज की बाकी फिल्मों की तरह इस फिल्म में भी ज्यादातर गाने बैकग्रांउड में ही हैं। फिल्म का टाइटिल सॉन्ग और 'ओ बाय चार्ली' गाने जितनी खूबसूरत तरीके से संगीतबद्ध किये गए हैं उनका फिल्मांकन भी उतना ही मजेदार है। फिल्म का संगीत फिल्म को कहीं रोकता नहीं बल्कि दृश्यों को और बेहतर करता है।

क्यों देखें
एक साथ मनोरंजक और जवाबदेह सिनेमा देखने के लिए। बिजली के टैटू और मनडोला की नौटंकी देखने के लिए भी।

क्यों न देखें
यदि आप इसे पूरी तरह से कॉमेडी फिल्म मान रहे हों। या फिर इसके उलट भी कि यदि आप इसे भूमि अधिग्रहण से जुड़ा हुआ एक सामाजिक सिनेमा सोचकर जाना चाहते हों तो।
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