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'राजधानी एक्सप्रेसः' एक बचकानी, दिशाहीन फिल्म

Fri, 04 Jan 2013 02:36 PM IST
रोहित मिश्र
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'राजधानी एक्सप्रेस' एक बेहद बचकानी, दिशाहीन और कमजोर फिल्मी समझ वाली फिल्म है। यह फिल्म न तो दर्शकों का मनोरंजन करती है और न ही सामाजिक विमर्श के नाम पर उन्हें कुछ ऐसा देती है जिसकी वजह से वह मनोरंजन से समझौता कर लें।
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एक बहुत साधारण सी सोच जो कि अब पुरानी पड़ चुकी है को फिल्म का रुप देने का असफल प्रयास किया गया है। फिल्म समाज में समता की बात बहुत ही हल्के तरीके से करती है। 'राजधानी एक्सप्रेस' फिल्म की यूएसपी लिएंडर पेस को बताया गया था। जबकि लिएंडर पेस इस फिल्म की सबसे कमजोर कड़ी हैं। दर्शकों के लिए उनको पर्दे पर झेलना मुश्किल होता है। फिर वह चाहे चुप रहें या रटे-रटाए संवाद बोल रहे हों। फिल्म का बैकग्राउंड म्यूजिक टीवी धारावाहिकों जैसा बचकाना है।

कहानी
फिल्म की कहानी राजधानी एक्सप्रेस से शुरू होती है। केशव (लिएंडर पेस) दूसरे की टिकट पर राजधानी एक्सप्रेस में बैठ जाता है। दिल्ली से मुंबई जा रही इस ट्रेन के उस कूपे में उसके साथ एक हाई प्रोफाइल कॉलगर्ल (पूजा बोस), मुंबई का एक फैशन डिजाइनर (सुधांशु पांडेय), एक बॉलीवुड लेखक (प्रियांशु चटर्जी) सफर कर रहे होते हैं।
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ट्रेन चलने के बाद समाज के अलग-अलग लोगों के बारे में बातें शुरू हो जाती हैं। कॉलगर्ल और फैशन डिजाइन समाज के लोअर मीडिल क्लास पर लगातार अटैक कर रहे होते हैं। केशव इस लोअर मीडिल क्लास को रिप्रंजेट कर रहा होता है। इन बातों ही बातों में केशव अपने बैग से एक पिस्तौल निकालकर बाकी पर तान देता है।

उसी ट्रेन से महाराष्ट्र सरकार के एक मंत्री के माता-पिता और देश के एक कैबिनेट मंत्री की पत्नी सफर कर रही होती हैं। कोच के अंदर पिस्तौल होने की बात एक राजनैतिक मुद्दा बन जाती है। केशव को आतंकी ठहरा दिया जाता है। मुंबई डिप्टी कमिश्नर यादव(जिमी शेरगिल) केशव का एनकाउंटर करना चाहते हैं। अचानक पता चलता है कि केशव के पास कोई बम नहीं है और उसकी पिस्तौल भी नकली है। इसके बाद केशव पागलों की ऐक्टिंग करने लगता है। बगैर कुछ ठीक से साफ किए यह फिल्म अचानक ही कई प्रश्नों के जवाब दिए बिना खत्म हो जाती है। ट्रेन की इस कहानी के बीच-बीच में केशव की जिंदगी से जुड़े कुछ धुंधले से फ्लैशबैक भी हैं।

अभिनय
फिल्म की सबसे कमजोर कड़ी अभिनय है। हर किरदार ने या तो ओवरऐक्टिंग की है या अंडरऐक्टिंग। अनुपम खेर के अभिनय स्कूल से अभिनय सीख कर अपनी पहली फिल्म कर रहे लिएंडर पेस इस फिल्म ने इस फिल्म में बहुत ही घटिया अभिनय किया।

टेनिस में जितना फुटवर्क का महत्व है अभिनय में उतना ही बॉडी लैंग्वेज का। लिएंडर पेस पूरी फिल्म में कही भी अपनी बॉडी लैंग्वेज से किरदार के साथ नहीं खड़े हुए हैं। उनसे बहुत कम संवाद बुलवाए गए हैं लेकिन जहां पर वह बोलते हैं लगता है कि आकाशवाणी पर मौसम का समाचार बता रहे हैं। जिसका उनसे कोई मतलब नहीं है। संवाद किरदार से निकलते ही जान नहीं पड़ते हैं। जहां पर लिएंडर नहीं बोलते हैँ वहां उनकी शक्ल देखकर लगता है कि उन्हें पेट दर्द या बदहजमी कि शिकायत है।

जिमी शेरगिल एक अच्छे अभिनेता हैं। उनके पास इस फिल्म में जो रोल था उसे देखकर दर्शक समझ ही नहीं पाए कि यह हीरो का किरदार है कि एंटी हीरो। फिर भी निर्देशक ने उनसे जो भी काम लिया है वह उसे बेहतर तरीके से कर गए हैं। एक डरपोक बंगाली के किरदार में प्रियांशु चटर्जी ने एक अच्छी ऐक्टिंग की है। फिल्म रिलीज के पहले उनके रोल को प्रमोट नहीं किया गया पर फिल्म में उन्हें फिल्म के हीरो लिएंडर पेस जितने ही फुटेज मिले। मुख्य टीटी सत्यम शर्मा के किरदार में गुलशन ग्रोवर ने जरूरत के मुताबिक अभिनय किया है। मुकेश ऋषि और किरण कुमार जैसे अच्छे कलाकारों को देखकर प्रश्न उठता है कि उन्होंने फिल्म की क्यों।

निर्देशन
अशोक कोहली ने संभवतः पहली बार किसी फिल्म को निर्देशित किया है। वह पहली बार फिल्म बना रहे थे लेकिन देखने वाले पहली बार फिल्म नहीं देख रहे थे। पूरी फिल्म में निर्देशकीय बचकानापन झलकता रहा। कभी वह सीन के मुताबिक बैकग्राउंड म्यूजिक में मात खाते, कभी बेवजह छोटी-छोटी उपकथाएं देकर। फिल्म की पटकथा और संवाद भी उन्होंने ही लिखे हैं। ऐसे में कमजोर स्क्रिप्ट राइटिंग का दोष उन्हीं के सर मढ़ा जाएगा।

पूरी फिल्म में अशोक कोहली इस बात को जस्टीफाई ही नहीं कर पाए कि दर्शक उनके नायक के साथ क्यों खड़ा हो और क्यों वह सिस्टम के खिलाफ जाए। केशव क्यों मुंबई के लिए ट्रेन में बैठता है। उसके पास नकली बंदूक कहां से आता है जैसे स्वाभाविक सवाल भी हल न हो सके। जिमी शेरगिल जैसे बेहतर एक्टर से भी अशोक कोहली ने बहुत औसत काम लिया है।

क्यों देखें
इस बात के लिए टेनिस के एक स्टार खिलाड़ी के पास 'स्टार' बनने की कितनी क्षमता है। साथ ही अच्छे कलाकारों को एक खराब फिल्म में व्यर्थ होते देखने के लिए भी।
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क्यों न देखें
यदि आप फिल्म से मनोरंजन जैसी स्वाभाविक उम्मीद करते हों तो यह फिल्म बिल्कुल न देखें। एक निहायत कमजोर फिल्म।
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