'लंच बॉक्स' देखने के दौरान मन बार-बार इस बात पर खुश होता रहा कि चलो भारतीय फिल्मकारों ने हम दर्शकों को कुछ तो समझदार समझना शुरू किया।
वर्ना होता तो ये है कि 'कुछ महेश भट्ट' पश्चिम के किसी देश में बनीं और हिट रही कोई फिल्म उठाते हैं। उस फिल्म में दो-चार कर्णप्रिय गाने, कुछ किस सीन के साथ काले बिस्तरों में लिपटकर-लिपटकर प्रेम कर रहे प्यासे प्रेमियों के कुछ गोपनीय दृश्यों का कोलाज बनाकर पेश कर देते हैं। वे इसलिए ऐसा करते हैं क्योंकि वे मानते हैं कि उन्हें या तो ये पसंद है या फिर 'चेन्नई एक्सप्रेस'।
यह अकेले महेश भट्टों, सुभाष घइयों और यश चोपड़ाओं की कहानी नहीं है। हिंदी फिल्मों में हर दौर में ऐसे महेश भट्ट होते रहे हैं, जिन्होंने इस बात का एहसास बार-बार कराया है कि उनका दर्शक न सिर्फ भावुक है बल्कि बेवकूफ और जल्दबाज भी है।
'लंच बॉक्स' इस धारणा को मजबूती के साथ तोड़ती है। वह यह बताती है कि निर्मल वर्मा या मिलान कुंदेरा की कहानियों जैसी भी कोई फिल्म भारत में रची जा सकती है।
लंच बॉक्स यह भी बताती कि 45 साल के किसी अभिनेता को 60 साल का बुजुर्ग विश्वसनीय तरीके से दिखाया जा सकता है।
यह फिल्म विश्व सिनेमा में हमारी उस पहचान को तोड़ेगी जहां हिंदी फिल्मों का मतलब नाच-गाना होता है। वैसा ही जैसे भारत को सांप-बिच्छू और बाबाओं का देश माना जाता रहा है।
'लंच बॉक्स' एक तरह की प्रेम कहानी ही है। इसे यूं कहें कि यह मजबूरी और विकल्प खत्म हो जाने के बाद उबरी प्रेम कहानी।
इस प्रेम कहानी के इर्द-गिर्द कुछ और भी कहने का प्रयास किया गया है। यह प्रयास इसलिए और भी महत्वपूर्ण बन जाता है क्योंकि इन प्रयासों की टोन बहुत ही अंडरप्ले है।
कुछ यूं बनती है प्रेम कहानी
55 और 60 के बीच झूल रहे एक क्लर्क साजन (इरफान खान) और 10 साल की बेटी की मां इला (निरमित कौर) की यह प्रेम कहानी गलती से डिब्बा बदल जाने की वजह से शुरू होती है।
इला द्वारा भेजा गया डिब्बा उसके पति को न जाकर साजन को पहुंच जाता है। साजन को खाना अच्छा लगता है और वह थैक्यू की एक चिट्ठी उस डिब्बे में छोड़ देता है। इसके बाद शुरू होता है चिटिठ्यों का आदान-प्रदान।
टिफिन में रोटियों के साथ भेजे जा रही इन चिट्ठियों की भाषा धीमे-धीमे अधिकार वाली हो जाती है।
एक-दूसरे से बिना मिले उसके अपनी दिल की बात कहने का अधिकार। दरअसल इन चिट्ठियों से इला और साजन अपनी जिंदगी की नहीं अपने जैसे हजारों-लाखों लोगों की सोच की बाते करते हैं।
चिट्ठियों में लिखे गए यह दस्तावेज जिंदगी बीतने के साथ संभावनाओं की बंद हो रही खिड़कियों की भी कहानी कहते हैं। एक समय ऐसा भी आता है जब ये एक-दूसरे से मिलने का प्लान करते हैं।
इस बात पर न जाकर कि वे मिलते हैं या नहीं हम आपसे कुछ और बातें करना चाहेंगे।
कुछ और बातें गौर कीजिए
हम फिल्म में उस पत्नी की बात करना चाहेंगे जो अपने पति की संतुष्टि के लिए चलते हुए पंखे को साफ करती है। हम एक और उस पत्नी के बात करना चाहेंगे जिसका मन उस समय पराठा खाने का करता है, जब उसके पति की लाश घर में रखी होती है।
वह अपनी बेटी से पूछ रही होती है कि लाश को ले जाने के लिए जो एंबुलेस आयी थी वह किस रंग की थी।
हम उस पत्नी की भी बात करना चाहेंगे जो अपने पति के कपडों को सूंघकर यह जान लेती है कि उसके पति का किसी लड़की के साथ अफेयर है लेकिन वह अपने पति से इस बारे में कुछ पूछती हैं।
फिल्म के कुछ दृश्य भी इस फिल्म को एक अलग कैटेगरी में खड़ा करते हैं। इला, साजन नाम के जिस अदृश्य आदमी से प्यार कर रही होती है उसकी याद करने के लिए वह अपने पडोसी आंटी से साजन फिल्म के गाने चलाने के लिए कहती है।
कुछ और खूबसूरत दृश्य नवाजुद्दीन और इरफान खान के बीच हैं। जब-जब ये दोनों सामने होते हैं तब-तब संवाद बहुत कम हैं लेकिन इनके बीच के बीच जो कुछ मजाकिया घटता है उसकी बराबरी रोहित शेट्टी या डेविड धवन कभी नहीं कर पाएंगे।