सामाजिक मुद्दों से जुड़े हुए नहीं होते आज के किरदार
इस दौरान उन्होंने यह भी कहा कि आज की फिल्मों के किरदार राजनीतिक विषयों या सामाजिक मुद्दों से जुड़े हुए नहीं होते, बल्कि खुद के किस्से-कहानियों और अनुभवों के बारे में ज्यादा होते हैं। उन्होंने आगे कहा, '60 और 70 के दशक में हिंदी फिल्मों के हीरो को साधारण पृष्ठभूमि का दिखाया जाता था, जिनमें मजदूर, टीचर, टैक्सी चालक या रिक्शा चालक तक शामिल होते थे, लेकिन अब तस्वीर बदल गई है। आज के हीरो अमीर परिवारों से आते हैं। उन्हें देश की राजनीतिक और सामाजिक स्थिति से कोई लेना-देना नहीं होता।'
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आपको तय कना होगा कि कैसी फिल्म बनेगी
जावेद अख्तर ने 'एनिमल' और 'चोली के पीछे क्या है' गाने का उदाहरण देते हुए कहा, 'आज के समय में एक बहुत बड़ी जिम्मेदारी सिनेमा बनाने वालों से ज्यादा सिनेमा देखने वालों पर हैं' क्योंकि अगर किसी फिल्म में हीरो किसी महिला से अपने जूते चाटने को कहे और वो फिल्म सुपरहिट हो जाए तो ये बड़ी खतरनाक बात है। वहीं, 'चोली के पीछे क्या है' गाने को लेकर जावेद ने कहा, 'इस गाने को 8-10 लोगों ने मिलकर बनाया, लेकिन ये गाना समाज में सुपरहिट हो गया। ये करोड़ो लोगो को अच्छा लगा था। ये बहुत डरावनी बात है। ये आप लोगों को तय करना होगा कि कैसी फिल्में बनेगी और कैसी फिल्में देखी जानी चाहिए'। जावेद अख्तर के अलावा इस महोत्सव में फिल्म निर्माता जयप्रद देसाई, आर बाल्की, अनुभव सिन्हा भी नजर आए।
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