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आज भी है इस बात का अफसोस, ऐश्वर्या की फिल्म 'ताल' में गाना गाकर हुई थीं फेमस

Sun, 25 Nov 2018 02:53 PM IST
सिंगर ऋचा शर्मा
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richa sharma
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पिताजी कथा वाचक थे। कहते थे अगर तुम्हें प्लेट में बनी बनाई रोटी मिल जाएगी, तो क्या स्वाद? मजा तो तब है, जब खुद बीज बोओ, काटो, पीसो, पकाओ और फिर खाओ...जब मैं बहुत छोटी थी तभी पिताजी को आभास हो गया था कि मैं एक गायिका बनूंगी। उन्होंने सबसे सामने यह बात कही थी कि मेरी बेटी संगीत में नाम कमाएगी। मैंने शहंशाही तरीके से संघर्ष किया है।
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मेरी जिंदगी में कभी भी कोई परेशानी आती थी, तो मेरे पिताजी हमेशा मुझसे कहते थे कि जीवन का यही मजा है। अगर तुम्हें प्लेट में बनी बनाई रोटी मिल जाएगी, तो उसका क्या मजा। स्वाद तो उस रोटी में अधिक आता है, जिसके बीज को तुम खुद बोओ, काटो, पीसो, पकाओ और खाओ। उस रोटी का स्वाद ही अलग होता है। मुझे मेरे पिताजी ने सिखाया है कि मुश्किलों का सामना हंसते-खेलते हुए करना चाहिए। मैंने जिंदगी में बहुत नाकामियो का सामना किया है। लेकिन इन नाकामियों से उभारकर मुझे इस मुकाम तक पहुंचाने में सबसे बड़ा रोल मेरे माता-पिता का ही रहा है। अगर वो नहीं होते, तो मैं भी नहीं होती। उन्होंने हर मोड़ पर मेरा साथ दिया। पिताजी मुझे झांसी की रानी कहा करते थे। एक कथावाचक के रूप में उनकी पहचान थी। अब नाम भी बता दूं- पंडित दयाशंकर।

‘स’ हमारे संगीत में बहुत महत्वपूर्ण होता है...

richa sharma
उनकी प्रेरणा से मुझमें एक कुशल गायक के गुण बचपन से ही विद्यमान थे। मुझे आवाज मेरे पिताजी से मिली है। वह बचपन से ही मुझे सुबह-सुबह उठाकर रियाज करवाया करते थे। हम रोज सुबह उठकर सांस का रियाज करते थे। ‘स’ हमारे संगीत में बहुत महत्वपूर्ण होता है। वह संगीत में एक बुनियाद का काम करता है। मेरी बुनियाद मेरे पिताजी ने बहुत मजबूत बनाई। वह सुबह मुझे बहुत लाड़ से उठाते थे। वह मुझ पर रियाज के लिए जोर नहीं डालते थे। वह माहौल बनाते थे और फिर हमारा रियाज शुरू होता था। मैं बचपन में बहुत शरारती थी, मुझे खुश रहना और दूसरों को खुश रखना बहुत पसंद है। मेरे माता-पिता बहुत ही साधारण थे। उन्होंने बहुत ही साधारण जीवन जिया है। मेरे पिताजी उसूलों के बहुत पक्के थे और मेरी मां बहुत शांत और सीधी थीं। मेरे परिवार में कोई भी गायक नहीं था।

मेरे पिताजी पुजारी थे, तो हम लोग हर सुबह साथ बैठकर एक साथ भजन करते थे। मुझे लगता है कि उसी से ही मेरी संगीत की विद्या की शुरुआत हुई। मुझे नूरजहां के गीतों ने भी काफी प्रभावित किया। मेरा बचपन फरीदाबाद में बीता है। लेकिन संगीत से मेरा लगाव मुझे दिल्ली खींच लाया। संगीत सीखने के लिए मुझे दिल्ली जाना था, लेकिन मेरे पिताजी मुझे अकेले भेजने के लिए तैयार नहीं थे और मैं संगीत सीखना चाहती थी। इसमें मेरे बिट्टू भइया ने मेरा साथ दिया। मैं दिल्ली अकेली न जाऊं इसलिए वह भी मेरे साथ संगीत सीखने के लिए जाने लगे। हमने गंधर्व विद्यालय में दाखिला लिया और यहां में संगीत में मेरी नीव पड़ी। संगीत को लेकर मैं पहले से ही काफी उत्साहित थी। इसलिए मैंने कभी नाकामियों से हार नहीं मानी। मैंने बहुत ही शान से अपनी सभी नाकामियों का सामना किया है। अब बॉलीवुड में मेरी यात्रा को 23 साल हो चुके हैं। 

‘नी मैं समझ गई’ गाना मेरे लिए टर्निंग प्वाइंट साबित हुआ

richa sharma
जब मैं सन 1995 में मुंबई गई, तो इसलिए थी, ताकि वहां अच्छे संगीत निर्देशकों से मिलूं और मुझे अपनी प्रतिभा दिखाने का मौका मिले। मैंने कई ऑडिशन्स दिए, पर कहीं से कोई जवाब नहीं मिला। इस दौरान निर्देशक सावन कुमार की एक फिल्म आने वाले थी, जिसके लिए उन्होंने माता की चौकी लगाई। उस माता की चौकी में, मैंने कई भजन गाए। इस दौरान वहां पर आशा भोसले, लक्ष्मीकांत प्यारेलाल और आदेश श्रीवास्तव जैसे दिग्गज मौजूद थे।

सावन कुमार को मेरे भजन पसंद आए, जिसके बाद उन्होंने मुझे अपनी फिल्म ‘सलमा पे दिल आ गया’ में गाने का मौका दिया। लोगों को मेरी आवाज पसंद आई और मुझे कई गाने मिलने लगे। वर्ष 1999 में फिल्म ‘ताल’ में ए. आर. रहमान के लिए ‘नी मैं समझ गई’ जब गाया, तो उसे खूब सराहना मिली। उन्होंने मुझ पर विश्वास किया और वह गाना मेरे लिए टर्निंग प्वाइंट साबित हुआ। 
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मैं समझती हूं कि आप किसी भी फील्ड में क्यों न हों, अगर आप उस काम को सिर्फ ड्यूटी समझकर करोगे, तो वह काम कभी पूरा नहीं होगा। आपको उस काम को पूरी लगन के साथ करना होगा। तभी आप उसमें कुछ अच्छा कर पाएंगे या कामयाब हो पाएंगे। पहले मेरे पिताजी मुझे समझाया करते थे और अब मैं नए सिंगर को भी यही सीख देती हूं कि इतनी बड़ी दुनिया में भगवान ने आपको संगीत के लिए चुना है, तो आपको उसकी इज्जत करनी चाहिए और अपने गाने को पूरी इमानदारी के साथ गाना चाहिए।

जीत या हार से कोई मतलब नहीं होना चाहिए। आपको लोगों का दिल जीतने के लिए गाना चाहिए। मैंने जब बॉलीवुड में गाना शुरू किया तब एक दिन मैं और पिताजी बैठे थे। ‘दुपट्टे का पल्लू’ गाना टीवी पर आया, तो मैंने अपने पिताजी को कहा कि देखिए यह गाना मैंने गाया है। तो मेरे पिताजी बोले कि इसमें लड़की तो कोई और है, तुम कहां हो। मेरे पिताजी मुझे स्टेज या टीवी पर गाते हुए देखना चाहते थे, लेकिन वह मेरा यह रूप नहीं देख पाए। क्योंकि 1998 में मेरे माता-पिता की मृत्यु हो गई थी।

शुरुआती दौर में मेरे गानों की ज्यादा पब्लिसिटी नहीं थी। मुझे पहचान ‘ताल’ फिल्म के बाद मिली। आज मैं कई फिल्मों में गीत गा चुकी हूं और लोग मुझे जानने लगे, लेकिन मेरा यह दौर मेरा यह रूप मेरे मातापिता नहीं देख पाए। इस चीज का मुझे काफी अफसोस है।

नेहा सजवाण से बातचीत पर आधारित
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