स्कॉलरशिप से भरी फीस
आदित्य ने बताया कि उनके पिता दादाजी दादा शिवराम श्रीवास्तव आईआईटी से सेवानिवृत्त हैं। बीटेक के दौरान शुरुआती दो साल की फीस उन्होंने ही भरी थी। इसके बाद उसे जर्मनी से स्कॉलरशिप मिली थी। इसके रूप में दो लाख रुपये की राशि मिली। इसका उपयोग अपनी पढ़ाई के लिए ही किया।
पहले प्रयास में नहीं मिली सफलता
आदित्य को आईएएस बनने की प्रेरणा अपनी मां के मामा विनोद कुमार से मिली, जोकि लवासना ट्रेनिंग एकेडमी मसूरी के डारेक्टर रहे हैं। बीटेक करने के बाद आदित्य को उनके पहले प्रयास में प्रारंभिक परीक्षा में सफलता नहीं मिली। पिछली परीक्षा में 236वीं रैंक के साथ आईपीएस के रूप में चयनित होने के बाद अब आईएएस बनने में सफलता हासिल की है।
पहली बार प्री-एग्जाम में फेल हुआ था पर हार नहीं मानी
अपने पहले प्रयास में प्रारंभिक परीक्षा में सफलता न हासिल होने के बाद, आदित्य ने नए सिरे से योजना बनाकर तैयारी शुरू की। उन्होंने कभी किसी कोचिंग से तैयारी नहीं की। इसके बजाय सेल्फ स्टडी के दम पर ही सिविल सेवा की तैयारी शुरू की। प्रांरभिक परीक्षा पास करने के बाद सिविल सेवा में अपने वैकल्पिक विषय के रूप में इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग का चयन किया। तैयारी के दौरान खुद को तरोताजा रखने के लिए वह थोड़ी देर गाने सुनते थे। इसके बाद फिर से पढ़ाई में लग जाते। पढ़ाई के दौरान वो सिर्फ खाना खाने के लिए अपने कमरे से निकलते थे।
टेस्ट सिरीज हल की, सिलेबस पर दिया ध्यान
आदित्य ने बताया कि सिविल सेवा का सिलेबस बहुत ज्यादा है। इसलिए पिछले साल में आए सवालों के जवाब देने का अभ्यास किया। टेस्ट सिरीज हल करने से काफी आत्मविश्वास बढ़ा। इसके साथ ही सिलेबस को देखकर उसे कवर करने की रणनीति बनाई। जो भी पढ़ा उसे बिलकुल स्पष्ट तौर पर तैयार किया। इससे परीक्षा में लिखना काफी आसान हो गया।
धैर्य न खोएं
सिविल सेवा की तैयारी काफी समय लेती है। इसलिए इसमें धैर्य नहीं खोना चाहिए। संभव है कि एक बार सफलता न मिले पर इससे हताश होने के बजाय दोबारा दोगुने उत्साह के साथ प्रयास करना चाहिए। सिलेबस के सभी भाग को अच्छी तरह से पढ़ें तथा नोट्स बनाएं। ऐसा करने पर सफलता जरूर मिलेगी।