लेकिन इस बीच, महाराष्ट्र स्वास्थ्य विज्ञान विश्वविद्यालय, नासिक को कोविड-19 महामारी की दूसरी लहर को देखते हुए अंतिम वर्ष एमडी सामान्य परीक्षा आयोजित नहीं कर सका और राज्य में कोरोना वायरस के मामलों में तेजी से वृद्धि के कारण परीक्षा को स्थगित करना पड़ा।
उधर, एम्स प्रॉस्पेक्टस के अनुसार, इसके लिए उम्मीदवारों को 31 जुलाई के भीतर पोस्ट-डॉक्टोरल पाठ्यक्रम के लिए अपेक्षित योग्यता प्राप्त करने की आवश्यकता है, ऐसा नहीं करने पर उन्हें संस्थान में प्रवेश लेने से वंचित कर दिया जाएगा। जब याचिका पर 19 जुलाई को सुनवाई हुई, तो एम्स, नई दिल्ली और भुवनेश्वर की ओर से पेश वकील ने कहा कि पहले दौर की काउंसलिंग पहले ही समाप्त हो चुकी थी, लेकिन सीट आवंटन की अंतिम तिथि 05 अगस्त तक बढ़ा दी गई थी, और काउंसलिंग के पहले दौर में चुने गए उम्मीदवार इस तिथि को या उससे पहले प्रवेश ले सकते हैं।
इसके बाद 04 अगस्त को, शीर्ष अदालत को सूचित किया गया था कि महाराष्ट्र स्वास्थ्य विज्ञान विश्वविद्यालय की अंतिम सैद्धांतिक एमएस / एमडी परीक्षा 16-23 अगस्त को होनी थी और उसके बाद, व्यावहारिक परीक्षा 24 और 25 अगस्त को आयोजित होने वाली थी। इस पर अदालत ने केवल यह निर्देश दिया कि मामले को मौखिक रूप से यह देखते हुए 27 अगस्त को सूचीबद्ध किया जाए कि यदि याचिकाकर्ता ने इस बीच आवश्यक योग्यता प्राप्त कर ली है और यदि कोई सीट खाली रहती है, तो याचिकाकर्ता को प्रवेश लेने की अनुमति दी जा सकती है।
वहीं, शुक्रवार को जब मामले की सुनवाई हुई तो महाराष्ट्र यूनिवर्सिटी ऑफ हेल्थ साइंसेज द्वारा याचिकाकर्ता को जारी किए गए प्रोविजनल डिग्री सर्टिफिकेट की फोटोकॉपी देखने के लिए सुप्रीम कोर्ट को सौंपी गई। उधर, एम्स की ओर से पेश वकील ने निर्देश पर प्रस्तुत किया, कि कार्डियोलॉजी में पोस्ट डॉक्टरल कोर्स में दो सीटें एम्स, ऋषिकेश में उपलब्ध हैं और एम्स, भुवनेश्वर में कार्डियोलॉजी में डीएम कोर्स में कोई रिक्ति नहीं है।
इस पर शीर्ष अदालत ने प्रतिवादियों को निर्देश दिया कि याचिकाकर्ता को 31 अगस्त को होने वाली काउंसलिंग में भाग लेने की अनुमति दी जाए और याचिकाकर्ता की रुचि होने पर एम्स, ऋषिकेश में डीएम कार्डियोलॉजी पाठ्यक्रम में उपलब्ध रिक्ति में याचिकाकर्ता को प्रवेश की अनुमति दी जाए। हालांकि, अदालत ने यह भी कहा कि इस आदेश को मिसाल के तौर पर नहीं माना जाना चाहिए।