धनुजा कुमारी यहां अंबालामुक्कू के रवि नगर की संकरी गलियों में घूमते हुए अपना दिन बिताती हैं और निवासियों से कहती हैं: "चेची, हम प्लास्टिक कचरा इकट्ठा करने आए हैं।"
हल्के पीले रंग की चूड़ीदार के ऊपर हरे रंग का ओवरकोट पहने हुए, वह हर दरवाजे पर एक प्लास्टिक की बोरी लेकर जाती हैं।
48 साल की धनुजा के चेहरे पर तनाव का शिकन है जिसके कारण वह बहुत बूढ़ी दिखती हैं, लेकिन वह हमेशा खुश रहती हैं।
धनुजा ने 9वीं कक्षा में स्कूल छोड़ दिया था, जब उनके माता-पिता ने उनकी शादी 19 वर्षीय 'चेंडा' कलाकार से कर दी थी।
उन्होंने तिरुवनंतपुरम की एक झुग्गी बस्ती चेंगलचूला में कई साल बिताए, जहां उन्हें कई संघर्षों का सामना करना पड़ा। लेकिन इन चुनौतियों ने बाद में एक लेखक के रूप में उनकी यात्रा को आकार दिया।
उन्होंने झुग्गी-झोपड़ी में रहने वाले अपने संघर्षों को बयां करते हुए एक किताब लिखी है और अब यह कन्नूर विश्वविद्यालय में बीए के छात्रों और कालीकट विश्वविद्यालय में एमए के छात्रों के पाठ्यक्रम का हिस्सा है।
किताब, "चेंगलचूलायिले एन्टे जीविथम" ("चेंगलचूला में मेरा जीवन") अब अपने पांचवें संस्करण में है।
धनुजा कुमारी ने कहा, "मैं एक कल्पनाशील लेखिका नहीं हूं। मैंने जो लिखा है, वह चेंगलचूला में जीवन ने मुझे दिया है। मुझे नहीं लगता कि यह साहित्य है, बल्कि मेरा जीवन है।"
उनका घर सीमेंट की खोखली ईंटों की चार पंक्तियों पर खड़ी टिन की चादरों का उपयोग करके बनाया गया है, जिसकी छत भी इसी तरह की टिन की चादरों से बनी है।
घर में खिड़कियां नहीं हैं और खाना पकाने और कपड़े धोने के लिए एक छोटा सा क्षेत्र है।
एक स्वचालित टॉप-लोडिंग वॉशिंग मशीन उसके घर में सबसे महंगी उपकरण है। अपने क्वीन कॉट पर बैठी, जो उसके एक कमरे के घर में लगभग 90 प्रतिशत जगह घेरता है, धनुजा ने याद किया कि वह कैसे एक लेखिका बनी।
धनुजा ने हमेशा की तरह मुस्कुराते हुए कहा, "उस समय हमारी कॉलोनी कुख्यात थी, और हम लगभग हर दिन पुलिस याचिकाएँ लिखते थे। वे मुझे याचिकाएं लिखने के लिए बुलाते थे, क्योंकि मैं उन्हें विस्तार से लिखती थी। इससे मुझे अपनी भाषा को बेहतर बनाने में मदद मिली।"
धनुजा का बचपन परेशानियों भरा रहा, उनके माता-पिता के बीच अक्सर झगड़ा होता रहता था।
"उनके बीच छोटी-मोटी समस्यां थीं, लेकिन कभी-कभी वे एक-दूसरे से एक साल या उससे अधिक समय तक मिलना बंद कर देते थे। इसलिए उन्होंने मुझे एक ईसाई कॉन्वेंट में भेज दिया, जहां मैं रही और पढ़ाई की। उन्होंने याद करते हुए कहा, कि कॉन्वेंट ने सभी छात्रों को एक अभ्यास का पालन करने पर जोर दिया, जो लेखन से उनका परिचय था।
धनुजा ने कहा, "कॉन्वेंट के शिक्षकों ने हमसे कहा कि हम दिन भर में जो कुछ भी करें, उसे एक छोटी नोटबुक में लिखें। हमने जो बुरे काम किए और जो अच्छे काम किए। ये मेरी पहली रचनाएं थीं।"
14 साल की उम्र में जब वह अपने पति के साथ वर्तमान एक कमरे वाले घर में रहने आई, तब भी उसने यही करना जारी रखा।
धनुजा ने कहा, "मेरे पति सिर्फ 19 साल के थे और हम परिवार चलाने के लिए पर्याप्त परिपक्व नहीं थे। बहुत सारी समस्याएँ थीं और जाति के आधार पर हमें जो भेदभाव झेलना पड़ता था और कॉलोनी में हमारा जीवन बहुत मुश्किल था। मैंने अपने सारे दर्द, अनुभव और बीच में मिली थोड़ी-बहुत खुशियां लिखीं।"
जैसे-जैसे वह बड़ी होती गई, वह समाज में सक्रिय होती गई और चाहती थी कि लोग उसकी कॉलोनी और उसके लोगों के बारे में अलग नजरिया रखें।
उसने कॉलोनी के लोगों के सम्मानजनक जीवन के अधिकारों के लिए जमकर लड़ाई लड़ी।
"मैं सभी से कहती थी - सामाजिक कार्यकर्ता, हमारी कॉलोनी में आने वाले शोधकर्ता - कि उन्हें सिर्फ उनकी अध्ययन सामग्री में दिलचस्पी है, हमारे जीवन में नहीं। मैं सार्वजनिक भाषण देती थी। यह सुनकर एक प्रसिद्ध लेखिका विजिला ने मुझे अपनी रचनाओं को एक किताब के रूप में संकलित करने के लिए प्रेरित किया।"
उन्होंने 38 साल की उम्र में किताब प्रकाशित की, जिसे पाठकों ने खूब सराहा और अब विश्वविद्यालयों ने इसे अपने पाठ्यक्रम में शामिल कर लिया है।