कोटला गांव की विकास यात्रा 300 साल पहले गांव के बीचोबीच खड़े पीपल के पेड़ के साथ ही शुरू हुई थी। टीले पर पीपल के पेड़ के आस-पास चिल्ला गांव से आए चार बुजुर्गों ने अपनी झोपड़ियां बनाई थीं। इनका विकास हुआ और कोटला गांव बस गया। कोटला गांव में आज 100 से ज्यादा घर हैं, इसकी आबादी सात हजार से ज्यादा है।
कोटला गांव शुरू से ही डेढ़ा गोत्र के गुर्जरों का गांव है। पूर्वी दिल्ली के बाकी गांवों के मुकाबले कोटला का क्षेत्रफल कम है। गांव का 700 बीघे का रकबा था। 1978 में गांव की जमीनें अधिग्रहीत कर ली गईं। सालों तक पशुपालन और दुग्ध उत्पादन ही गांव के लोगों के जीवनयापन का मुख्य श्रोत था। लेकिन निगम की तरफ से पशुपालन पर रोक लगाए जाने के बाद यह किराएदारों और सेल-परचेज के काम में लग गया। गांव के अधिकतर लोग परचून, डेयरी, हार्डवेयर, फर्नीचर का काम करते हैं।
100 साल बाद भी गांव का पुराना लाल डोरा
कोटला गांव के निवासी चौधरी मोनू सिंह ने कागजात दिखाते हुए बताया कि उनकी जमीनों को सरकार ने 25 पैसे प्रति गज के हिसाब से अधिग्रहीत कर लिया। लेकिन 1915 से आज तक गांव का लाल डोरा नहीं बढ़ा। गांव की आबादी के साथ गांव का दायरा कई गुना बढ़ गया है। लेकिन आज भी गांव का लाल डोरा पुराने पीपल के पेड़ के आस-पास के 10-20 घरों के इर्द गिर्द है। उन्होंने बताया कि लाल डोरे के बाहर के घरों को बैंक निगेटिव एरिया मानते हैं।
गांव की जमीन पर बसी कॉलोनियां
मयूर विहार फेज-1 के पॉकेट 1, 2 और 5, त्रिलोकपुरी की कॉलोनियां कोटला गांव की जमीन पर बनीं। संजय झील में भी गांव की कुछ जमीन गई। इसके अलावा निगम का एक प्राथमिक विद्यालय और खिचड़ीपुर के नाम से आईटीआई गांव की जमीन पर ही बना। गांव के लोगों ने सामाजिक सहयोग से गांव की जमीन पर गूर्जर भवन बनाया है। इसमें छात्रावास भी बना है।
सामुदायिक भवन का 15 साल से इंतजार
कोटला गांव में पंचायत भवन नहीं है। गांव के लोगों ने 3 बीघा जमीन बचा कर रखी है। यहां पर 7 मंजिला सबसे बड़ा सामुदायिक भवन बनाने का प्रस्ताव है। चौधरी रामू ने बताया कि 15 सालों में 5 बार इसका शिलान्यास हो चुका है, लेकिन अबतक निर्माण शुरू नहीं हुआ। यह बन जाए तो बेटियों की बारात रोकने की परेशानी खत्म हो जाएगी।
पीपल के पेड़ ने बाढ़ से रखा सुरक्षित
कोटला गांव के बुजुर्ग चौधरी रमेश चंद्र ने बताया कि 1973 में बाढ़ आई तो लोगों ने पीपल की शाखाओं में उल्टी खाट बांधकर कई दिन गुजारा किया। पीपल के पेड़ ने कई पीढ़ियों को आगे बढ़ते देखा है। शादी-विवाह व बाकी शुभ अवसरों पर आज भी महिलाएं घर में बना पकवान पहले निकालकर पीपल के पेड़ को चढ़ाती हैं। यह प्रथा पुराने जमाने से चली आ रही है।
हुक्के से मेहमान नवाजी सबसे खास
गांव के लोगों ने रीति, रिवाज और परंपराओं को बचा कर रखा है। आज भी घर में मेहमान आए तो पानी पिलाने के बाद सबसे पहले हुक्का भरके उसके सामने रखा जाता है। चौधरी यशपाल सिंह ने अपना हुक्का दिखाया, जिसे उन्होंने पिछलेे साल 2800 रुपये में ऑर्डर देकर बनवाया है।
पीपल के पास के घरों में नहीं आता पानी...
गांव में 1988 में पानी की पाइप लाइन बिछी थी, जो कि अब जर्जर हो गई है। सालों से पानी की पाइप लाइनें बदलने की मांग की जा रही है।
- चौधरी यशपाल सिंह
गांव की ऊबड़ खाबड़ जमीन पर बसा है, उसी के अनुसार पानी की पाइप बिछ गई, गांव के बीच पीपल के पेड़ के आस पास पानी ही नहीं जाता।
- चौधरी रमेश चंद्र
गांव में जिन घरों में पीने का पानी आता भी है, लाइनें छतिग्रस्त होने के कारण कई सालों से गांव में गंदे पानी की सप्लाई हो रही है।
- चौधरी रामू
गांव में बच्चों के खेलने के लिए एक भी पार्क नहीं है, इसके अलावा सामुदायिक भवन बन जाए तो बारात रोकने की परेशानी समाप्त हो जाएगी।
- चौधरी मोनू सिंह