दिल्ली-नोएडा सीमा पर बसा कोंडली गांव कभी दुग्ध उत्पादन केंद्र होता था। अपने पड़ोसी गांवों घड़ौली और दल्लूपुरा के साथ यहां से पूरी दिल्ली को दूध की आपूर्ति होती थी, लेकिन बढ़ते शहरीकरण के साथ पेशा भी बदल गया। साल 2010 में दिल्ली में पशुपालन पर रोक लगा दी गई थी, जिस कारण लोगों का रोजगार खत्म हो गया।
गांव की जमीन पर कालोनियां बसने के साथ किराएदारी ही आमदनी का जरिया बचा है। दिल्ली व नोएडा में काम करने वाले लोग यहां किराए के मकान में रहते हैं। कोरोना महामारी ने गांव के लोगों पर बुरा असर डाला। लॉकडाउन में हुए पलायन से इनकी आमदनी ठप हो गई थी। हालांकि, अब लोगों की वापसी से ग्रामीणों ने राहत मिली है।
स्थानीय निवासियों का कहना है कि पहले कोंडली में बड़ी मात्रा में दूध होता था। कोंडली के साथ पड़ोसी गांवों दल्लूपुरा और घड़ौली के हर घर में दो से चार गाय और भैंस होती थी। कोंडली गांव के बुजुर्ग सीताराम कौशिक ने बताया कि गांव के तकरीबन सभी लोग दूध का कारोबार करते थे। दूध को साइकिलों पर लादकर पुरानी दिल्ली, शाहदरा समेत दूसरे बड़े बाजारों में हलवाइयों के यहां बेचते थे। गांव का रकबा करीब 1,200 बीघे का था।
यहां गुर्जर, ब्राह्मण, अनुसूचित जातियों समेत पूरी आबादी दूध बेचती थी। इससे अच्छी आमदनी हो जाती थी। जैसे-जैसे दिल्ली शहरीकृत होती गई, गांव की जमीन का विकास कार्यों के लिए अधिग्रहण किया जाता रहा।
दिल्ली और नोएडा की बसावट इसी की जमीन पर है। पूर्वी दिल्ली में कोंडली एक्सटेंशन, न्यू कोंडली, मयूर विहार फेज-3, डीडीए फ्लैट्स कॉलोनी कोंडली गांव की जमीनों पर बनी। कोंडली गांव के नाम पर ही कोंडली विधानसभा का भी नाम रखा गया। अब न्यू कोंडली बाजार नोएडा से सटे बड़े हिस्से का थोक बाजार भी है।
डेढ़ा गोत्र के 24 गांवों में से एक है कोंडली
राजधानी दिल्ली क्षेत्र में गुर्जरों के डेढ़ा गोत्र के 24 गांव हैं, कोंडली उन्हीं में से एक है। सीताराम कौशिक बताते हैं कि गुर्जरों ने इन गांवों में अपने साथ ब्राह्मणों और बाकी जातियों को भी संरक्षित रखा। गुर्जरों के अलावा गांव की बाकी आबादी भी खेती और बड़े पैमाने पर पशुपालन ही करती थी।
गांव में आज भी जीवित हैं परंपराएं
घड़ौली गांव करीब एक हजार साल पुराना है। सीताराम कौशिक बताते हैं कि गांव बसने से पहले बंजारों ने गांव के शिव मंदिर के नजदीक कुंआ बनवाया था। आज भी शादी-विवाह के मौके पर कुएं पर कूप-पूजन होता है। कुएं को लोहे की जालियों से संरक्षित रखा गया है।
पहली सरकारी नौकरी की चर्चा
सीताराम ने बताया कि गांव में सरकारी नौकरी करने वाले का रुतबा होता था। 1936 में पंडित रामनाथ की सेना के सीओडी डिपार्टमेंट में नौकरी लगी। कोंडली के साथ-साथ आसपास के गांवों में उनकी नौकरी के चर्चे थे। लोग उनका सर्वाधिक सम्मान करते थे। उन्हें बाबूजी कहकर संबोधित किया जाता था। दल्लूपुरा के रतन बाबू भी सरकारी नौकरी करते थे, उन्हें भी बाबूजी कहा जाता था। चिल्ला गांव के पंडित गणपत ‘गन्नू’ ने 1904 में सबसे पहले बीए पास किया था। यह पूरे क्षेत्र में सर्वाधिक पढ़े लिखे व्यक्ति थे।
मुआवजे के लिए भटक रहे लोग
हमारे पिताजी से डीडीए और नगर निगम ने जमीन ली थी। उस रुपये को पाने के लिए तीसरी पीढ़ी अब भी कोर्ट के चक्कर काट रही है।
- सीताराम कौशिक
गांव की करीब 1000 बीघा जमीन सरकार ने ले ली। हालात ये हैं कि लोगों के पास न उनके खेत रहे और न उनका दूध का कारोबार।
- ज्ञानचंद वर्मा
घर में चार जोड़ी बैल थे। इसी तरह गायें और भैंसें भी थी। पहले के जमाने में रोजाना हजारों लीटर दूध दिल्ली में बेचा जाता था।
- राजेंद्र प्रसाद
गांव का सबसे ज्यादा दूध पुरानी दिल्ली के हलवाइयों के यहां जाता था। सुबह-सुबह दूध लेकर नाव से यमुना पार करते थे।
- रोहताश कुमार
आज जहां गांव का मंदिर है, वहां पहले एक शिवलिंग हुआ करता था। बचपन में यहां खेला करते थे। करीब 25 साल पहले यहां मंदिर बना।
- महावीर सिंह