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Ukraine Crisis : चुनौतियों से जूझकर महिला दिवस पर घर लौटीं उपासना पांडेय

Wed, 09 Mar 2022 05:48 AM IST
दुष्यंत शर्मा अमर उजाला नेटवर्क, नई दिल्ली

सार

खारकीव में फंसी थीं, बोलीं-यूक्रेन में कोई घायल है तो बंकर में शरण लिए हैं कई।
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उपासना... - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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मेडिकल की पढ़ाई करने यूक्रेन गईं देवरिया की उपासना पांडेय चुनौतियों से जूझते हुए तकरीबन 13 दिन बाद आखिर महिला दिवस पर मंगलवार को को घर पहुंच गईं। वह खारकीव में फंस गई थीं। घर पर मां ने आरती उतारकर बेटी का स्वागत किया। उपासना का कहना है कि यूक्रेन के विभिन्न शहरों में भारतीय अभी भी फंसे हैं। कोई घायल है तो किसी ने बंकर में शरण ले रखी है। उनकी मदद केंद्र सरकार को करनी चाहिए। साथ ही मेडिकल विद्यार्थियों के लिए अपने देश में पढ़ाई का इंतजाम होना चाहिए।

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बीआरडी इंटर कॉलेज की शिक्षक अन्नपूर्णा पांडेय की बेटी उपासना यूक्रेन में एमबीबीएस की पढ़ाई कर रही थीं। घर वापसी के लिए उन्होंने हवाई जहाज का टिकट 26 फरवरी का बुक कराया था। लेकिन 24 फरवरी को ही बमबारी होने लगी। उसके कारण मेडिकल विश्वविद्यालय के हॉस्टल के बंकर में करीब 700 छात्र एकत्र हो गए। खाने के संकट के बीच किसी तरह दो मार्च तक विद्यार्थी बंकर में छिपे रहे।

विश्वविद्यालय के ऊपर दोबारा बम गिरने के बाद किसी तरह दस किमी दूर रेलवे स्टेशन पैदल छिप-छिपकर पहुंचे, लेकिन वहां ट्रेन में भारतीय विद्यार्थियों को धक्का देकर उतार दिया गया। ऐसे में विद्यार्थी रेलवे स्टेशन पर फंस गए। इसी बीच दो मार्च को एंबेसी की एडवाइजरी में कहा गया है कि तुरंत आप लोग खारकीव छोड़ दें। ऐसे में पैदल किसी तरह रोमानिया बार्डर पहुंचे वहां केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया मिले। केंद्र सरकार ने हवाई जहाज से दिल्ली भेजा।
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घर आईं बेटियां तो छा गईं खुशियां
युद्धग्रस्त यूक्रेन में फंसी ताजनगरी की अंजलि पचौरी, भाव्या चौहान व जया कुमारी भी मंगलवार को घर पहुंच गईं। बेटियां घर आईं तो आंगन में खुशियां छा गईं। फूल मालाओं से बेटियों का स्वागत हुआ। अब तक ताजनगरी के सभी 74 छात्र-छात्राएं घर लौट आए हैं। दस दिनों से तीनों बेटियां खारकीव में फंसी थीं। तमाम मुश्किल हालात से जूझते हुए उन्होंने घर वापसी का सफर तय किया है। तीन एनआरआई वहां फंसे हुए हैं। उन्हें भी निकालने के प्रयास जारी हैं।
शमसबाद रोड निवासी भाव्या चौहान ने बताया कि वह पांच साल से खारकीव में रह कर एमबीबीएस कर रही हैं।

हमले के पहले दिन हम मेट्रो स्टेशन पर सोए। फिर हमें पता चला कि बिल्डिंग में बंकर हैं। सात दिन हम वहां रहे। बंकर में खाना-पीना खत्म हो गया था। 24 घंटे में एक बार खाकर गुजारा किया। फिर एक मार्च को वहां धमाका हुआ। जिसमें एक भारतीय छात्र मारा गया। वह मेरा जूनियर था। उस दिन भी वहां से निकल नहीं सके। ट्रेन में धक्कामुक्की व अभद्रता हुई। फिर वहां से मजबूर होकर हम पिसाचिन तक पैदल गए। वहां एबेंसी की तरफ से व्यवस्था की गई थी। वहां से टर्नोपिल होते हुए रोमानिया आए। जहां से घर लौट पाए हैं।

एयरपोर्ट पर मौसा व मौसी से लिपटकर रोने लगा दक्ष
यूक्रेन-रूस युद्ध के बीच यूक्रेन में फंसे जिले का अंतिम छात्र सादाबाद प्रगतिपुरम निवासी अनुज प्रताप सिंह का पुत्र दक्ष मंगलवार को हंगरी के रास्ते मंगलवार सुबह पांच बजे इंदिरा गांधी अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे पर उतर गया। यहां दिल्ली में रहने वाले उसके मौसा-मौसी ने उसकी अगवानी की। यहां मौसा-मौसी से लिपट कर दक्ष रोने लगा। हालांकि, युद्धग्रस्त क्षेत्र से सकुशल वापस लौटने की खुशी दक्ष के चेहरे पर झलक रही थी। कहा, वहां हमारी आंखों में नींद गायब थी। हर समय यही लगा रहता था कि किस तरह हम अपनी देश पहुंच जाए। हंगरी तक पहुंचने के लिए रात के समय माइनस तापमान में कई किमी पैदल चलना पड़ा। इस दौरान भूखे-प्यासे भी रहना पड़ा। हंगरी पहुंचने के बाद भारतीय दूतावास ने उनकी काफी मदद की। स्वदेश लौटने में भारत सरकार का कार्य काफी सराहनीय रहा। दक्ष ने प्रधानमंत्री को धन्यवाद दिया है। 

जीवन भर याद रहेंगे युद्ध के पल : राहुल
कुरावली (मैनपुरी) नगर के मोहल्ला फर्द खाना निवासी डॉक्टर सूरज पाल सिंह का 26 वर्षीय पुत्र राहुल मंगलवार की सुबह यूक्रेन से वाया रोमानिया होकर भारत वापस आ गया। एमबीबीएस के छात्र राहुल ने कहा कि यूक्रेन में युद्ध के दौरान बिताए हुए वह पल वह जीवन में कभी नहीं भुला सकेंगे। राहुल ने बताया कि 24 फरवरी को रूस ने जब हमला बोला तो कॉलेज में मौजूद सभी छात्र घबरा गए। छात्रों ने भारत लौटने के लिए अनुमति मांगी तो न कॉलेज प्रशासन कोई व्यवस्था कर सका न ही भारतीय दूतावास। 27 फरवरी को वह हंगरी बॉर्डर के लिए रवाना हुआ। 

जिंदगी बचाने के लिए 30-35 किलोमीटर पैदल चलना पड़ा
देवरिया: रात में 12 बजे के करीब बम धमाका शुरू हो जाता था, आसमान नारंगी दिखने लगता था। बंकर में छिपकर रात गुजारनी पड़ती थी। जिंदगी बचाने के लिए 30-35 किलोमीटर पैदल भी चलना पड़ा। खुखुंदू थाना क्षेत्र के जैतपुरा गांव निवासी अरमानुल्लाह सिद्दीकी ने बताया कि वह युद्ध के चौथे दिन छात्रों के साथ कीव से लवीव जाने के लिए ट्रेन पर सवार होकर चल दिए। वहां मेडिकल कॉलेज हास्टल में एक दिन ठहरने के बाद अगले दिन दोपहर को बस से 13 घंटा सफर कर लोन्या पहुंचे। वहां हंग्री चेक पोस्ट पार करके बूडा पेस्ट राजधानी पहुंच गए। वहां तीन दिन के बाद फ्लाइट से दिल्ली पहुंचे। संवाद

कुछ दूर गिरी थी मिसाइल, कांप उठा था कलेजा
यूक्रेन के खारकीव से पिसोचिन जाते समय हमारे सामने कुछ दूरी पर एक मिसाइल गिरी और जोरदार धमाके के साथ फट गई थी। हालात कुछ ऐसे थे कि दहशत से कलेजा कांप उठा था। सभी लोग जमीन पर लेट गए थे। करीब दस मिनट तक जमीन से उठने की हिम्मत नहीं हुई। यूक्रेन से लौटे ?रामपुर के मुदित राजपूत ने वहां के हालात और अपनी घर वापसी के संघर्ष को बयां करते हुए अनुभव साझा किए। उन्होंने कहा कि हम 25 किलोमीटर तक पैदल चले थे। हाथ में तिरंगा था। किसी ने न तो रोका और न ही टोका। वह भी तब जब चारों तरफ बमबारी हो रही थी। ज्वालानगर रफत कालोनी निवासी शिक्षक प्रेम सिंह के पुत्र यूक्रेन की खारकीव नेशनल मेडिकल यूनिवर्सिटी से एमबीबीएस कर रहे हैं। यह उनका पहला साल है। उन्होंने रास्ते की तमाम कठिनाइयों का जिक्र करते हुए वहां के भयावह हालात के बारे में जानकारी दी। 

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भारत जितनी तेजी से कोई देश अपने नागरिक नहीं निकाल सका

युद्ध के हालात से बचाकर भारत लाए गए विद्यार्थियों से तमिलनाडु के सीएम एमके स्टालिन ने बातचीत की, जहां बच्चों ने बताया कि उन्हें निकालने के लिए भारत द्वारा चलाया गया अभियान बाकी सभी देशों से तेज था। उन्होंने कहा कि ऑपरेशन गंगा के जरिए अगर सरकार उनकी देखभाल नहीं करती तो वे बड़ी मुश्किल में फंस सकते थे।

बातचीत में स्टालिन ने उनसे पूछा कि उन्होंने कितने दिन कष्ट सहे? छात्राओं ने तुरंत जवाब दिया कि 2 दिन। साथ में बताया कि यूक्रेन से निकलने के लिए सीमा पार करने में कुछ बाधाएं थीं। सीमा पार करने के बाद सरकार ने पूरी मदद दी और हालात को नियंत्रण में लिया। स्टालिन ने पूछा कि खाने की क्या व्यवस्था थी? छात्राओं ने बताया कि इसकी भी पूरी व्यवस्था थी। सीमा पार करने के बाद सरकार ने पूरी देखभाल की। 
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