'आज सात मार्च है, मेरे पापा का बर्थडे है। हर साल पापा और दादाजी के साथ मिलकर हम घूमने जाते थे। पूरे दिन मस्ती करते थे। पिछली बार तो हमने साथ में बर्थडे मनाया था। उससे पहले जब कोरोना की वजह से हमारे स्कूल बंद हुए थे। तब भी पापा आपने हमारे लिए खाना बनाया। दादाजी के साथ मिलकर केक भी काटा था। आप जानते हैं पापा हमें केक कितना अच्छा लगता है? मगर अब घर में कोई नहीं है। आप जब से गए हैं तब से हमें केक खाने को नहीं मिला।
पापा, आज आपका बर्थडे है, देखो, दादी याद कर रही हैं। मम्मी सुबह से कुछ नहीं बोल रही हैं। मैं और प्रथम भईया हम दोनों कमरे में बैठे आपकी राह देख रहे हैं। मैं आपका प्यारा हर्षित हूं ना पापा, प्लीज हमारे पास आ जाओ। हम फिर से मस्ती करना चाहते हैं। अपने साथ दादाजी को भी लेकर जरूर आना। हमारे साथ कोई खेलना वाला नहीं है। दादा जी की बहुत याद आती है, पापा। दिन भर दादी ही भागदौड़ करती हैं। रात को उनके घुटने भी बहुत दर्द करते हैं, मैं और भईया दोनों उनके घुटने दबाते हैं ताकि दादी को नींद आ सके। दादी को हमारी बहुत चिंता है पापा, वो अकेले में रोती हैं लेकिन हमको देखते ही कहती हैं, चिंता न करो, सब ठीक होगा।
पापा पिछले साल दादा को कोरोना हुआ तो आपने कहा था सब ठीक होगा लेकिन पांच दिन में आप दोनों घर से निकले और फिर कभी वापस नहीं आए। पापा आप कब आओगे? ये पुकार दिल्ली के दयालपुर निवासी सात वर्षीय हर्षित की है जिसके पिता दीपक कुमार और दादाजी की कोरोना संक्रमण के चलते मौत हुई। पिछले वर्ष 26 अप्रैल को दादाजी और दो मई को दीपक कुमार की मौत हुई। इनके बाद परिवार में अब दादी, दो बच्चे और उनकी मां ही बची हैं।
सोमवार को दिल्ली में कोरोना महामारी के दो वर्ष पूरे होने पर जब दीपक कुमार के परिजनों से संपर्क किया गया। इस बीच हर्षित अपने पिता के बारे में ही पूछने लगा। हर्षित की बुआ और दीपक कुमार की बहन रामा बताती हैं कि कोरोना कभी आता है तो कभी चला जाता है लेकिन इसका असर हमारे जीवन में अंधेरा कर गया है। हर दिन-रात भाई और पिता की याद तो आती है साथ ही उन दोनों बच्चों को देख किस्मत पर भी रोना आता है कि आज उनके बच्चों की परवरिश तक मुश्किल हालातों में हैं।
दीपक कुमार की तरह राजधानी में ऐसे सैंकड़ों परिवार हैं जो कोरोना महामारी का दंश झेलते आ रहे हैं। इनमें अधिकांश परिवार साल 2021 में आई कोरोना लहर के दौरान चपेट में आए। वहीं कई परिवार ऐसे भी हैं जिनके घरों में मौतें हुई लेकिन उन्हें सरकार ने कोविड में नहीं गिना। लक्ष्मी नगर निवासी शांति देवी के पति, ससुर और सास तीनों की मौत 11 दिन के भीतर मैक्स पटपड़गंज अस्पताल में हुई लेकिन इनमें से केवल ससुर की मौत को ही संक्रमण से जोड़कर माना गया। शांति बताती हैं कि वे अब आस-पड़ोस के बच्चों को कोचिंग देकर अपना और अपने बच्चे का पालन कर रही हैं।