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अमर उजाला खास: कोरोना महामारी में पुरुषों से ज्यादा महिलाएं एम्स में भर्ती, देखें क्या कहते हैं आंकड़े?

Tue, 08 Mar 2022 01:40 AM IST
Vikas Kumar परीक्षित निर्भय, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

नई दिल्ली स्थित अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) के चिकित्सा अभिलेख विभाग से मिली जानकारी के अनुसार साल 2020 में जब कोरोना महामारी की शुरूआत हुई तो उस साल एम्स में पुरुषों से ज्यादा महिला मरीजों को भर्ती किया गया। ऐसा पहली बार है जब एम्स में एक साल के भीतर पुरुषों की तुलना में महिला रोगियों की संख्या करीब दोगुना रही।
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दिल्ली एम्स - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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पुरूषों से ज्यादा महिलाएं कोरोना महामारी की चपेट में आई हैं। इसका खुलासा एम्स के आंकड़ों से हो रहा है। इससे पता चलता है कि संक्रमण का जोखिम महिलाओं में सबसे ज्यादा देखने को मिला है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह आंकड़ा और भी बड़ा हो सकता है। वजह यह कि इसमें सिर्फ भर्ती होने वाली महिलाओं की संख्या पर प्रकाश पड़ता है। जबकि गरीब तबके की बड़ी संख्या में ऐसी भी महिलाएं रही हैं, जिन्होंने अपने परिवार के पुरूष सदस्य के इलाज को प्राथमिकता दी है।

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नई दिल्ली स्थित अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) के चिकित्सा अभिलेख विभाग से मिली जानकारी के अनुसार साल 2020 में जब कोरोना महामारी की शुरूआत हुई तो उस साल एम्स में पुरुषों से ज्यादा महिला मरीजों को भर्ती किया गया। ऐसा पहली बार है जब एम्स में एक साल के भीतर पुरुषों की तुलना में महिला रोगियों की संख्या करीब दोगुना रही।

आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2020 के दौरान एम्स में 45,523 महिला मरीजों को भर्ती किया गया। इस दौरान 22,216 पुरुष मरीज भर्ती हुए। यह संख्या एम्स के मुख्य अस्पताल, सीएन सेंटर और सीडीईआर से जुड़ी है। जबकि इससे पहले तक एम्स में हर वर्ष पुरुष मरीजों की संख्या अधिक रहती थी। हाल ही में जारी एम्स की वार्षिक रिपोर्ट के अनुसार साल 2020-21 के दौरान एम्स में 67 हजार से भी अधिक मरीजों को भर्ती किया गया जिनमें से 2873 की उपचार के दौरान मौत हुई। वहीं 27193 लड़के और 13434 लड़कियों को भी भर्ती किया। 
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एम्स के सामुदायिक चिकित्सा विभाग के एक वरिष्ठ डॉक्टर ने बताया कि साल 2020 में करीब छह महीने तक पूरे देश ने लॉकडाउन का सामना किया। उस दौरान स्वास्थ्य सेवाएं काफी प्रभावित भी हुईं। करीब सात महीने तक एम्स में कोरोना के मरीज ही सबसे अधिक प्रतिदिन भर्ती होते थे। इसलिए भी यह संख्या अधिक दिख रही है। महामारी का असर महिलाओं पर काफी अधिक हुआ। यह आंकड़ा बताता है कि महिलाओं ने आगे आकर समय रहते अपना उपचार कराया। 

आईसीएमआर-नेशनल इंस्टीट्यूट फॉर रिसर्च इन रिप्रोडक्टिव हेल्थ के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. राहुल गजभिए का कहना है कि लैंगिक आधार पर बीमारी मरीज का चयन नहीं करती है लेकिन महिला स्वास्थ्य पर सार्वजनिक चर्चाएं होना भी जरूरी है। कोरोना महामारी का असर महिलाएं खासतौर पर गर्भवती महिलाओं पर काफी पड़ा है। नवजात शिशुओं के स्वास्थ्य को भी प्रभावित किया जिसके चलते आईसीएमआर ने एक नेटवर्क खड़ा कर चिकित्सीय अध्ययन शुरू किए और देश भर के डॉक्टरों का मार्गदर्शन भी किया। 
 

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क्या कहते हैं आंकड़े

 
साल पुरुष मरीज महिला मरीज
2016 49780 38132
2017 50590 43128
2018 54360 45110
2019 55933 45523
2020 22216 45523


महिला-बच्चियों पर हर तरफ से असर
प्रोत्साहन इंडिया फाउंडेशन की सोनल कपूर बताती हैं कि महामारी का लैंगिक प्रभाव काफी रहा है। महिला और बच्चियों पर हर तरफ से असर डाला है। महिलाओं के खिलाफ हिंसा में बढ़ोतरी, घरेलू हिंसा, महिला स्वास्थ्यकर्मी, महिलाओं के स्वास्थ्य, नौकरी गंवाना, वेतन न मिलना, पढ़ाई और पलायन सबसे बड़े असर हैं। ऐसी बहुत सी महिलाएं दिल्ली के ही अलग अलग इलाकों में है जिन्हें कोरोना संक्रमण होने के बाद भी उपचार नहीं मिला लेकिन वे घर में रहकर ठीक भी हो गईं। इनमें कई पोस्ट कोविड के चलते वे खुद को पहले जैसा स्वस्थ्य महसूस नहीं कर पा रही हैं लेकिन गरीबी और कम जागरुकता के चलते स्वास्थ्य प्राथमिकता नहीं है। 
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